
विवेकानंद कुशवाहा
पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने कम मेहनत नहीं की थी, लेकिन बांग्ला अस्मिता और टीएमसी वर्कर के भय ने दीदी को तब बड़ी जीत दिला दी। इस बार भाजपा ने टीएमसी को ऐसी किसी राजनीति का मौका ही नहीं दिया। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री भाजपा के मुख्य रणनीतिकार (शिल्पकार) के तौर पर कोलकाता में डटे रहे।
माइक्रो लेवल बूथ प्रबंधन
यह अमित शाह के राजनीतिक प्रबंधन का सबसे प्रमुख अस्त्र है। शाह जी ने बंगाल में ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल को आक्रामक रूप से लागू किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि हर मतदान केंद्र पर उनके कार्यकर्ता मौजूद रहें। टीएमसी के वर्कर से भय के कारण पहले यह काम करने में बीजेपी को दिक्कत आती थी। इस बार उन दिक्कतों का हल चुनाव आयोग द्वारा केंद्रीय बल की मजबूत तैनाती से निकला।
सत्ता विरोधी लहर को अपने पक्ष में करना
बीजेपी ने ममता बनर्जी सरकार के 15 साल के कार्यकाल की ‘एंटी-इनकंबेंसी’ को बखूबी भुनाया। गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी रैलियों में शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला और अन्य कथित भ्रष्टाचार के मुद्दों को लगातार उठाया, जिससे टीएमसी के खिलाफ एक माहौल बना।
महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था
NCRB के आंकड़े देखें, तो अन्य राज्यों के मुकाबले पश्चिम बंगाल महिलाओं के लिए ज्यादा सुरक्षित है, लेकिन आरजी कर अस्पताल की घटना और उसको लेकर टीएमसी सरकार के लापरवाह रवैये से बंगाल में जो जनाक्रोश पैदा हुआ, उसे बीजेपी ने मुद्दा बने रहने दिया। मृत महिला डॉक्टर की मां रत्ना देबनाथ को बीजेपी ने पानीहाटी से उम्मीदवार बना दिया। अभी वह जीत की ओर अग्रसर हैं।
ध्रुवीकरण और हिंदू वोटों का एकीकरण
रणनीतिक तौर पर बीजेपी ने खुद को बंगाली हिंदुओं के रक्षक के रूप में पेश किया। टीएमसी पर ‘तुष्टीकरण’ का सीधा आरोप लगाया ही नहीं, बल्कि लोगों को यह एहसास भी कराया। इससे उत्तर बंगाल, हुगली, बर्धमान और हावड़ा जैसे क्षेत्रों में हिंदू वोटों का भारी एकीकरण बीजेपी के पक्ष में हुआ। बांग्लादेश की घटना ने इसमें और हवा दी। इस तरह बांग्ला अस्मिता पर धार्मिक एकीकरण भारी पड़ा।
क्षेत्र के हिसाब से अलग रणनीति
गृह मंत्री अमित शाह ने पूरे बंगाल को एक ही नजरिये से देखने की जगह क्षेत्रीय रणनीति बनायी। उत्तर बंगाल (राजबंशी और गोरखा बहुल क्षेत्र) और जंगलमहल (आदिवासी बहुल) के इलाकों में बीजेपी ने अपने पिछले प्रदर्शन को न सिर्फ कायम रखा, बल्कि वहां अपनी जड़ें इतनी गहरी कर लीं कि टीएमसी वहां वापसी नहीं कर सकी।
घुसपैठी के मुद्दे को एसआइआर की शक्ति
बॉर्डर इलाके सहित बंगाल में घुसपैठ का मुद्दा बेहद प्रभावी रहा। चुनाव आयोग द्वारा किये गये SIR ने इस मुद्दे को और प्रभावी बनाने में बड़ा काम किया। ऐसी बॉर्डर वाली सीटों पर बड़ी मुस्लिम आबादी होते हुए बीजेपी ने गेन किया है। 2021 के चुनाव में जहां भाजपा का वोट शेयर 38.5 प्रतिशत था, वह इस बार बढ़कर 45.5 तक पहुंच गया। यानी भाजपा ने सात प्रतिशत वोट गेन किया। वहीं, पिछले चुनाव में 48.5 प्रतिशत वोट शेयर पाने वाली टीएमसी 40.8 प्रतिशत तक पहुंच गयी। यानी 7.7 प्रतिशत वोट शेयर घटा है। यानी खेला करने वाली टीएमसी के साथ ही खेला हो गया।
टीएमसी के बागियों को बनाया हथियार
अमित शाह की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा टीएमसी के असंतुष्ट और प्रभावशाली नेताओं को बीजेपी में शामिल करना था। शुभेंदु अधिकारी को पिछले चुनाव के बाद से विपक्ष का नेता बनाकर फ्रंटलाइन पर रखा और चुनाव से ठीक पहले तापस रॉय जैसे कद्दावर टीएमसी नेताओं को पार्टी में लाना इसी मास्टरप्लान का हिस्सा था। तापस रॉय भी जीत की ओर अग्रसर हैं। उम्मीद है कि शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बनेंगे।
बंगाल के अपने वर्कर को कमजोर नहीं पड़ने दिया
पीएम मोदी द्वारा झाल मूढ़ी खाना, सेल्फी वीडियो बनाना और अमित शाह की ताबड़तोड़ रैलियों ने पार्टी कार्यकर्ताओं में भरपूर ऊर्जा भर दी। पूरे देश से बीजेपी के सांसद/विधायक जैसे मजबूत वर्कर बंगाल पहुंचे हुए थे। यही कारण हैं कि आज बीजेपी पश्चिम बंगाल में एक अभूतपूर्व सत्ता परिवर्तन करने में सफल हो पायी है। इस तरह आज गंगोत्री से गंगासागर तक कमल खिल गया है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

