केरल में एलडीएफ़ की पराजय के साथ ही वाम-युग का अंत

केरल में एलडीएफ की हार के साथ भारत में वाम राजनीति के लंबे युग के अंत पर चर्चा तेज है, जिसमें ज्योति बसु से लेकर पिनराई विजयन तक का सफर शामिल है।

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सुशोभित

केरल में एलडीएफ़ की पराजय के साथ ही एक वाम-युग का अंत हो गया है! जून 1977 के बाद से- यानी बीते 49 वर्षों में- यह पहली बार है, जब देश के किसी भी राज्य में वामदलों की सरकार न होगी। यों 1957 में जब केरल में सीपीआई के ईएमएस नम्बूदरीपाद मुख्यमंत्री बने थे तो वो न केवल भारत बल्कि दुनिया की भी पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार थी। नम्बूदरीपाद भारत के पहले ग़ैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी थे और उनकी सफलता ने पं. नेहरू को भी चौंकाया था। उन्होंने दो कार्यकालों (1957–1959 और 1967–1969) में लगभग छह वर्ष शासन किया और केरल में वाम-राजनीति की नींव रखी। ये नम्बूदरीपाद की नीतियाँ ही थीं, जिन्होंने केरल को भारत का सबसे साक्षर राज्य बनाया और आज भी केरल भारत में सोशल इंडिकेटर्स (मानव-विकास) में सबसे ऊपर है- हाई लिट्रेसी, जीवन-प्रत्याशा, हेल्थकेयर और जन्म व शिशु मृत्यु दरों- दोनों का ही नीचे होना। सरकारों का काम यही तो है- अपने लोगों को उत्तम गुणवत्ता की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराना और सामाजिक ढाँचे को सुरक्षित रखना।

लेकिन लेफ़्ट की वास्तविक ‘विनिंग स्ट्रीक’ तो जून 1977 में बंगाल में सीपीएम की जीत से शुरू हुई थी, जिसने ज्योति बसु को 23 वर्षों के लिए कलकत्ते की कमान सौंपी। वे आज तक भारत में सर्वाधिक समय तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले नेता हैं। 1996 में वे प्रधानमंत्री भी बन सकते थे, लेकिन सीपीएम के ‘हिस्टोरिक ब्लंडर’ ने एचडी देवगौड़ा का पथ प्रशस्त किया और उसके बाद से कोई कम्युनिस्ट नेता 7 रेसकोर्स रोड के समीप नहीं पहुँच पाया है। ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम-सरकार ने बंगाल में प्रसिद्ध भूमि-सुधार किए, पंचायती राज व्यवस्था को मज़बूत किया, सामाजिक-संकेतकों पर उम्दा प्रदर्शन किया और राजनैतिक स्थायित्व प्रदान किया। उनके बाद बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कमान सम्भाली और बंगाल में 34 वर्षों तक वाम-परचम फहराता रहा। कलकत्ता भारत को बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करता रहा। एक स्टेट-पॉलिसी के रूप में साम्प्रदायिकता और पूँजीवाद-प्रणीत शोषण का प्रतिकार : आज तो इस नैतिक-निकष की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

2011 में जब बंगाल वामदलों के हाथ से गया, तब त्रिपुरा में माणिक सरकार मोर्चा सम्भाले हुए थे और 2018 में जब त्रिपुरा वामदलों के हाथ से गया तो केरल में पिनराई विजयन पदस्थ हो चुके थे। आधी सदी तक चलने वाली यह ‘स्ट्रीक’ आज टूट गई है। इस कालखण्ड में बिहार, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी वाम-राजनीति का गहरा असर रहा। बिहार में सीपीआई-एमएल प्रभावी रही। कम्युनिस्ट प्रभाव वाली बिहार की किसान-सभाएँ प्रसिद्ध हैं। त्रिपुरा में उन्होंने आदिवासी-कल्याण पर बड़ा काम किया। 2004 में लेफ़्ट के 59 सांसदों की सहायता से केंद्र में यूपीए सरकार बनी थी। तब सीपीएम के सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा-स्पीकर के रूप में अपनी सौम्यता, गम्भीरता और विद्वत्ता से सभी का सम्मान अर्जित किया था। यूपीए के अनेक महत्त्वपूर्ण नीतिगत कार्यक्रमों- जैसे मनरेगा, वन-संरक्षण और सामाजिक-क्षेत्र की अन्य योजनाओं को लेफ़्ट का नैतिक-समर्थन प्राप्त था। अमरीका से एटमी सौदे के चलते उस गठबंधन में दरारें आ गई थीं।

वाम-दलों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जातीय पहचान की नहीं, वर्गचेतना की राजनीति करते थे। आप हिन्दू हों या मुसलमान, ब्राह्मण हों या शूद्र- राज्यसत्ता न तो आपकी जातीय-पहचान का उत्सव मनाएगी, ना ही उसे चुनावी राजनीति के साधन के रूप में भुनाएगी। राष्ट्रवाद के नारों से बढ़कर सर्वहारा का उन्नयन उनके लिए मायने रखता था। साम्प्रदायिकता की उनके यहाँ कोई जगह नहीं थी। वे वेलफ़ेयर-स्टेट के निर्माण और सामाजिक-संकेतकों पर राज्य को ऊपर उठाने पर एकाग्र थे। यक़ीनन, उनके खाते में भी नाकामियाँ दर्ज़ हुई हैं, लेकिन वाम-राजनीति ने जिस तरह के सुशिक्षित, मृदुभाषी, मेधावी और सामाजिक-न्याय के प्रति प्रतिबद्ध नेता पैदा किए- उपरोक्त उल्लेखित नम्बूदरीपाद, ज्योति बसु, सोमनाथ चटर्जी, माणिक सरकार के अलावा मानवेन्द्रनाथ रॉय, हरकिशनसिंह सुरजीत, मुज़फ़्फ़र अहमद, एके गोपालन, सीताराम येचुरी, प्रकाश-वृन्दा करात- उनकी अगर आज के नेताओं से तुलना करें तो आपके सामने अंतर स्पष्ट हो जायेगा। जैसे मूढ़, अनैतिक, भ्रष्ट और आपराधिक तत्त्व आज राजनीति में शीर्ष पर जा बैठे हैं, वह निश्चय ही हताश करने वाला है।

वाम-नीति के मूल में यह विचार है कि पूँजीवाद के अश्वमेध यज्ञ की लगाम अगर नहीं थामी गई तो सामाजिक-विषमता विद्रूपता की हद तक चली जाएगी, अमीर और अमीर, ग़रीब और ग़रीब होता चला जाएगा, मध्यवर्ग निरे उपभोगवाद में डूब जाएगा और प्राकृतिक-मानवीय संसाधनों का निर्लज्ज शोषण होने लगेगा। दक्षिण-नीति इसके ठीक उलट है : पूँजीपति की सेवा में पूर्णतया तत्पर रहो और उसकी हर अनैतिक माँग पूरी करो। लेकिन ट्रिक यह है कि चुनाव में वोट पूँजीपति के नाम से नहीं, धर्म, जाति, राष्ट्र और जातीय-पहचानों के आधार पर माँगे जाते हैं। अलबत्ता चुनाव में दक्षिणपंथ की फंडिंग यह पूँजीपति ही करता है। मार्क्स का मत था कि वर्गचेतना विकसित होने से सर्वहारा का अंतरराष्ट्रीयकरण होगा और वह जातीय-पहचान की बेड़ियों से मुक्त होगा। उन्होंने निश्चित ही धर्म, पूँजी और बाज़ार के शैतानी तिहरे गठजोड़ की क्षमताओं को कम करके आँका था।

आज जब अमेरिका में बर्नी सैंडर्स और ज़ोहरान ममदानी जैसे वाम-रुझान वाले नेता लोकप्रिय हैं, क्यूबा और लाओस में वाम-शासन है, ब्राज़ील और मैक्सिको के सत्ताप्रमुख वामपंथी हैं, श्रीलंका में भी हाल ही में एक वामपंथी राष्ट्रपति चुने गए हैं- तब भारत में 50 साल लम्बे वाम-युग का अंत हुआ है। आशा है केरल में कांग्रेसनीत-यूडीएफ़ संवैधानिक-लोकतांत्रिक मूल्यों को क़ायम रखेगी।
हर चीज़ के लिए शुक्रिया, कॉमरेड। राजनीति में जीत-हार चलती रहती है, लेकिन जिन विचारों, मूल्यों और मान्यताओं को आपने सामने रखा, उन्हें परास्त नहीं किया जा सकता और इतिहास निश्चय ही उनका मूल्यांकन करेगा। उम्मीद है कि आप फिर वापसी करेंगे!

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।