
सासाराम : संत पौल्स विद्यालय, सासाराम में गुरुवार को शिक्षकों के लिए एक विशेष विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का विषय था-“आदर्श शिक्षक की कसौटी और अध्यापन कला”। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता विद्यालय के संस्थापक एवं संकल्पक डॉ. एस.पी. वर्मा ने की। मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षण केवल पेशा नहीं, बल्कि एक पवित्र दायित्व है।

उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति पर ईश्वर सबसे अधिक प्रसन्न होता है, उसी को शिक्षक बनने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक की गोद में ही राष्ट्र का निर्माण, विकास और विनाश तीनों छिपे होते हैं। अपने संबोधन में उन्होंने तुलसीदास की चौपाई भी सुनाई-
“राखई गुरु जो कोप विधाता।गुरु विरोध नहिं कोउ जग त्राता।”
डॉ. पाण्डेय ने बताया कि एक आदर्श शिक्षक में सात प्रमुख गुण होने बेहद जरूरी हैं। उन्होंने संस्कृत श्लोक के माध्यम से इन गुणों को समझाया-
“विद्धत्वं, दक्षता, शीलं, संक्रांति:अनुशीलनम्।
शिक्षकस्य गुणा: सप्त:, सचेतस्त्वं, प्रसन्नता:।”
जानिए आदर्श शिक्षक के 7 जरूरी गुण

विद्धत्व (ज्ञान)
उन्होंने कहा कि शिक्षक को अपने विषय का गहरा ज्ञान होना चाहिए। बिना सही जानकारी के वह प्रभावी अध्यापन नहीं कर सकता।
दक्षता
सिर्फ जानकारी होना काफी नहीं है, बल्कि उसे सही तरीके से समझना और लागू करना भी जरूरी है। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि जानकारी और समझदारी में बड़ा अंतर होता है। जब ज्ञान व्यवहार में उतरता है, तभी दक्षता पैदा होती है।
शील (चरित्र)
उन्होंने कहा कि शिक्षक का चरित्र अनुकरणीय होना चाहिए। आचार-विचार और संस्कार ही शिक्षक की असली पहचान हैं। इसी वजह से शिक्षक को ‘आचार्य’ कहा जाता है। उन्होंने अंग्रेजी की प्रसिद्ध कहावत भी साझा की—=-
“When wealth is lost, nothing is lost;
health is lost, something is lost;
but when character is lost, everything is lost.”

संक्रांति (ज्ञान पहुंचाने की कला)
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि शिक्षक में यह क्षमता होनी चाहिए कि वह अपनी बात विद्यार्थियों तक सरल और प्रभावी तरीके से पहुंचा सके।
अनुशीलन (निरंतर अभ्यास)
उन्होंने कहा कि एक अच्छे शिक्षक को लगातार अपने विषय का अध्ययन और पुनरावृत्ति करते रहना चाहिए। इस दौरान उन्होंने रामचरितमानस की चौपाइयों का भी उल्लेख किया।
सचेतनता
आदर्श शिक्षक को हर समय जागरूक रहना चाहिए और नई-नई अच्छी बातों को सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए।
प्रसन्नता
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि शिक्षक को हमेशा मुस्कुराते हुए कक्षा में प्रवेश करना चाहिए। उसका व्यक्तित्व ऐसा हो कि विद्यार्थियों को सकारात्मक ऊर्जा महसूस हो।

उन्होंने कालिदास के मालविकाग्निमित्रम् का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस शिक्षक में अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों का संतुलन होता है, वही समाज में सबसे अधिक सम्मान पाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विद्यालय के प्रबंधक एवं संस्थापक डॉ. एस.पी. वर्मा ने कहा कि रांची से आकर डॉ. जेबी पाण्डेय का शिक्षकों को मार्गदर्शन देना विद्यालय परिवार के लिए गर्व की बात है।

इस मौके पर विद्यालय के सभी शिक्षक-शिक्षिकाएं मौजूद रहे। कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत प्राचार्या डॉ. अनुराधा वर्मा ने किया। मंच संचालन राजगृही तिवारी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती विनीता श्रीवास्तव ने दिया। कार्यक्रम की फोटोग्राफी ओम प्रकाश तिवारी ने की। अंत में शांति पाठ और राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

