
शिवानंद तिवारी
धीरे-धीरे ऐसा महसूस होने लगा है कि नीतीश कुमार अब पहले की तरह खबरों के केंद्र में नहीं रहे। एक समय था जब अखबार खोलिए, टेलीविजन देखिए या यूट्यूब चैनल चलाइए, बिहार से जुड़ी लगभग हर बड़ी खबर में सबसे प्रमुख चेहरा नीतीश कुमार का ही दिखाई देता था। ऐसा नहीं है कि वे सत्ता से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के कारण आज भी बिहार की राजनीति और वर्तमान सरकार पर उनका प्रभाव बना हुआ है। बहुत हद तक यह सरकार उन्हीं की राजनीतिक विरासत और समर्थन पर टिकी हुई है। फिर भी सत्ता का प्रत्यक्ष प्रभाव कुछ और ही होता है।
दुनिया का नियम है कि पद और सत्ता के साथ लोगों का व्यवहार भी बदलता है। कलेक्टर और कमिश्नर दोनों बड़े अधिकारी होते हैं, लेकिन जनता और नेताओं की भीड़ अक्सर वहीं दिखाई देती है जहाँ तत्काल निर्णय लेने की शक्ति होती है। राजनीति में भी यही सच है।
मुझे एक पुरानी घटना याद आती है। उन दिनों मैं आर ब्लॉक में रहता था। सरदार हरिहर सिंह मुख्यमंत्री थे. अक्सर उन्हीं के घर के सामने से निकलना होता था. एक दिन उनके घर के सामने से गुजरा तो देखा कि रोज की तरह परिसर में तंबू लगे हुए हैं, लोगों की भीड़ है, चहल-पहल है। रात में लगभग साढ़े नौ-दस बजे दूसरी ओर से लौटते समय देखा कि पूरा इलाका सुनसान पड़ा है। केवल गेट के सामने बनी पुलिया पर एक कर्मचारी बैठा था। बाद में पता चला कि उसी दिन उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया था। दिन भर जो भीड़ उमड़ रही थी, वह कुछ ही घंटों में गायब हो गई। सत्ता का यही स्वभाव है। जब कोई व्यक्ति सत्ता में होता है तो उसके आसपास तरह-तरह के लोग जमा रहते हैं। किसी को कोई काम निकलवाना होता है, किसी को अपना प्रभाव बढ़ाना होता है, तो कोई केवल सत्ता के निकट दिखाई देना चाहता है। कई लोग इस कोशिश में रहते हैं कि किसी तरह मुख्यमंत्री के साथ एक तस्वीर में आ जाएँ। ऐसे अनेक चेहरे हम लोगों ने वर्षों तक नीतीश कुमार के साथ तस्वीरों में देखे। संभव है कि आज उनमें से कई चेहरे किसी और सत्ता केंद्र के आसपास दिखाई देते हों। यही राजनीति की वास्तविकता है।
लेकिन सत्ता का सबसे बड़ा भ्रम तब पैदा होता है जब किसी व्यक्ति को लगने लगता है कि यह स्थायी है। चाहे वह नीतीश कुमार हों, लालू प्रसाद यादव हों, सम्राट चौधरी हों या कोई और—यदि किसी को यह विश्वास हो जाए कि सत्ता हमेशा उसके पास ही रहेगी, तो वही सबसे बड़ी भूल है। इतिहास गवाह है कि सत्ता कभी किसी की स्थायी नहीं रही। हर व्यक्ति को एक दिन पद छोड़ना पड़ता है। जो चीज स्थायी रहती है, वह है व्यक्ति का काम। यदि कोई नेता शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई या जनकल्याण के क्षेत्र में ऐसा काम कर जाए जिससे लोगों का जीवन बेहतर हो, तो उसका नाम लंबे समय तक याद रखा जाता है। व्यक्ति भले न रहे, लेकिन उसके काम उसकी पहचान बन जाते हैं। लोग वर्षों बाद भी कहते हैं कि अमुक सुविधा, अमुक सुधार या अमुक योजना उसके शासनकाल में शुरू हुई थी।
यह बात केवल नेताओं पर ही लागू नहीं होती। प्रशासन में भी ऐसा ही होता है। कोई अच्छा कलेक्टर यदि जनता के लिए काम कर जाए तो वर्षों बाद भी लोग उसे याद रखते हैं। मुझे याद है कि आरा के तत्कालीन जिलाधिकारी मनोज श्रीवास्तव की जब बदली हुई थी, तब उसके विरोध में महीनों तक आंदोलन चला था। आज उन्हें इस दुनिया से गए काफी समय हो चुका है, लेकिन मध्यम आयु और उससे अधिक उम्र के बहुत से लोग आज भी उन्हें सम्मान के साथ याद करते हैं।
अंततः सत्ता आती-जाती रहती है। भीड़, प्रचार और सुर्खियाँ भी समय के साथ बदल जाती हैं। जो चीज बची रह जाती है, वह है व्यक्ति का जनहित में किया गया कार्य और लोगों की स्मृतियों में उसके प्रति बना सम्मान। वही किसी भी सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की वास्तविक और स्थायी उपलब्धि होती है।

