
एक पत्रकार के निधन की खबर अखबार में सिंगल कॉलम से ज्यादा की हकदार नहीं होती अगर वो कोई प्रख्यात संपादक न हो तो। सोचता हूं कि यह व्यवस्था कैसे बनी होगी कि किसी पत्रकार का अगर निधन हो जाए तो उसकी खबर अखबार में सिंगल कॉलम की जगह घेरेगी। इससे ज्यादा की नहीं। किसी संपादक ने ही तय किया होगा, या फिर मैनेजमेंट का ही निर्देश होगा कि किसी पत्रकार के निधन को अधिक प्रमुखता नहीं देनी है। या फिर यह भी हो सकता है कि पेजीनेटरों और उप संपादकों ने ही तय कर लिया होगा कि कहीं सिंगल कॉलम में निबटा देना है।
एक पत्रकार अपना पूरा जीवन समाज के लिए जीता है। जैसे राजनेता जीते हैं, चंद पत्रकार व्यवस्था के साथ सेटिंग कर अपने लिए बेहतर जीवन तलाश लेते हैं पर अधिकांश के हिस्से जिंदगी भर संघर्ष के सिवा कुछ नहीं आता। दूसरों की खबर लेनेवाला पत्रकार खुद अपनी ही कायदे की खबर नहीं बन पाता। अखबारों और मीडिया संस्थानों को इस नजरिये में बदलाव लाने की जरूरत है। कल दीपेश जी के निधन के बाद उनकी खबर अखबारों में खंगाल रहा था। प्रभात खबर में सिंगल, हिन्दुस्तान में यही स्थिति और दैनिक भास्कर भी उनके साथ साम्य लिए हुए था। माने सिंगल कॉलम। हालांकि, दैनिक आजाद सिपाही ने उनके निधन को तीन कॉलम में जगह दी। यह सम्मानजनक महसूस हुआ। दीपेश जी करीब 35 चालीस साल से पत्रकारिता कर रहे थे। क्या वे प्रमुख अखबारों में वे सिंगल कॉलम से अधिक की जगह के हकदार नहीं थे। अगर एक अखबार में अखबारनवीस का निधन ही लगभग नगण्य या महत्वहीन हो जायेगा तो समाज फिर पत्रकार को कितनी तवज्जो देगा। अखबार के मालिकों, संपादकों और पत्रकारों को इसपर विचार अवश्य करना चाहिए।
दीपेश जी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

