अब सिर्फ़ यादों में रोशनी बिखेरेगा ‘दीपप्रभा’ – मलबे में बदल गया भागलपुर का वह सिनेमा, जिसे जवाहर बाबू ने कहा था ‘नायाब तोहफा’

भागलपुर का प्रतिष्ठित दीपप्रभा सिनेमा हॉल अब इतिहास बन गया। कभी शहर की सांस्कृतिक पहचान रहा यह सिनेमाघर ढहने के साथ अनगिनत यादों और एक दौर का अंत कर गया।

Razi Ahmad
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  • प्रदीप विद्रोही

Deepprabha Cinema : भागलपुर शहर की सांस्कृतिक पहचान रहे दीपप्रभा सिनेमा हॉल का अस्तित्व अब इतिहास के पन्नों में सिमटता जा रहा है। कभी हजारों दर्शकों की तालियों, सीटियों और सिनेमाई उत्साह का गवाह रहा यह प्रतिष्ठित सिनेमा हॉल आज मलबे में तब्दील हो चुका है। इसके साथ ही भागलपुर के एक पूरे दौर की यादें भी जैसे ढह गई हैं।

वर्ष 1992 में स्वतंत्रता सेनानी बाबू दीपनारायण सिंह और उनकी सुपुत्री श्रीमती प्रभावती देवी की स्मृति में उनके दामाद जवाहर प्रसाद जायसवाल ने इस सिनेमा हॉल का निर्माण कराया था। यह सिर्फ़ एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि शहर को दिया गया एक सांस्कृतिक उपहार था।

समय के साथ उन्होंने दीपप्रभा को बेच दिया और कोलकाता जाकर बस गए। लेकिन उनके जाने के बाद भी इस सिनेमा हॉल से जुड़ा अपनापन कभी कम नहीं हुआ। हर वर्ष भागलपुर के ऐतिहासिक मां काली विसर्जन की संध्या पर सपरिवार यहां फिल्म देखना एक परंपरा-सी बन गई थी।
दीपप्रभा में प्रदर्शित पहली फिल्म थी ‘आई मिलन की रात’। गुलशन कुमार द्वारा निर्मित 1991 की हिंदी फिल्म आई मिलन की रात में अविनाश वाधवन और शाहीन मुख्य कलाकार थे।

उस दौर के मैनेजर जयनारायण सिंह, जो पहले शारदा चित्र मंदिर से जुड़े थे, मशीनमैन भोला राम, जो कभी पिक्चर पैलेस में भी कार्यरत रहे, और अन्य कर्मचारियों से हर मुलाकात इस सिनेमा को सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि लोगों के रिश्तों का केंद्र बना देती थी।

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रजी अहमद एक उभरते हुए कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो वर्षों का अनुभव है। उन्होंने न्यूज़ अरोमा में काम करते हुए विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपनी लेखन शैली को मजबूत बनाया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंटेंट राइटिंग, न्यूज़ लेखन और मीडिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं में अच्छा अनुभव हासिल किया। वह लगातार सीखते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं।