शंभु नाथ चौधरी

एक अदद सरकारी नौकरी… मिडिल क्लास परिवार के लिए महज नौकरी भर नहीं होती, उसकी उम्मीदों की आखिरी किस्त होती है। इसमें किसी मां के बिके हुए कंगनों की कीमत छिपी होती है… तो किसी पिता के ओवरटाइम में बहे पसीने का एक-एक कतरा। यह दस बाई दस के कमरे में जवानी झोंककर काटी गई हजारों रातों का हिसाब होती है। यह लाखों युवाओं के सपनों, सब्र और संघर्ष का निवेश होती है। लेकिन अफसोस… झारखंड में प्रतियोगी परीक्षा देने का मतलब सिर्फ अपनी काबिलियत साबित करना नहीं रह गया है, बल्कि सिस्टम के घोटालों और लूप होल्स को झेलना भी बन गया है। छात्र कम्पटीटर बाद में हैं, पहले सिस्टम के ‘लैब रैट’ बना दिए गए हैं… जिन पर आए दिन नए-नए प्रयोग किए जाते हैं।
जेपीएससी और जेएसएससी… जिनपर मेरिट के निष्पक्ष इम्तिहान लेने की जिम्मेदारी थी, वह विवादों, अविश्वास और अनिश्चितताओं का सबसे बड़ा एपिसेंटर बन चुके हैं। राज्य में सरकारें बार-बार बदलीं, लेकिन नौकरी देने वाली इन दोनों प्रमुख संस्थाओं का कैरेक्टर शुरू से लेकर अब तक नहीं बदला। यहां मेरिट की दौड़ शुरू होने से पहले ही युवाओं के हिस्से कभी पेपर लीक, कभी सीटों की सौदेबाजी, कभी गलतियों से भरे प्रश्न-पत्र, कभी अदालत की रोक, तो कभी सीबीआई और सीआईडी की छापेमारी आ जाती है। यह सिर्फ प्रशासनिक नाकामी नहीं है। यह सरकारी नौकरी की आस में पूरी उम्र झोंक देने वाली पीढ़ियों के भरोसे की हत्या है। सवाल सीधा है… इन हालात का जिम्मेदार कौन है? क्या झारखंड बनने के बाद की कोई ऐसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा आपको याद है, जो बिना विवाद के पूरी हुई हो? कभी पेपर लीक… कभी मॉडल आंसर-की में दर्जनों गलतियां… कभी ओएमआर पर सवाल… कभी मेरिट लिस्ट विवाद… कभी परीक्षा रद्द… कभी अदालत की फटकार। आखिर यह सिलसिला कब थमेगा? गलती हर संस्था से हो सकती है। लेकिन जब गलती ही पैटर्न बन जाए…तो उसे गलती नहीं, सिस्टम और गवर्नेंस की नाकामी कहा जाता है।
अब जरा ताजा मामला देखिए। जेएसएससी ने मई 2025 में टीडीपीएल नाम की कंपनी को अनियमितताओं और गोपनीयता में गंभीर चूक के कारण ब्लैकलिस्टेड कर दिया। फिर वही कंपनी… राज्य की सबसे प्रतिष्ठित जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा कराने पहुंच गई। आखिर कैसे और क्यों? इस एजेंसी से राज्य के किस रसूखदार का याराना है? क्या जेएसएससी और जेपीएससी के दफ्तरों के बीच इतना फासला है कि एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी की जानकारी तक नहीं पहुंची? आखिर उस फाइल पर हस्ताक्षर किसने किए, जिसमें इस एजेंसी को परीक्षा के लिए प्रश्न पत्र बनाने से लेकर रिजल्ट जारी करने के पूरे प्रॉसेस के सभी आठ संवेदनशील असाइनमेंट सौंपे गए? उसकी पात्रता किसने जांची? रिस्क एसेसमेंट किसने किया? अगर काली सूची में दर्ज एजेंसी दोबारा इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी हासिल कर लेती है, तो यह पूरे सिस्टम की नाकामी है।
14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा में विवाद की कितनी परतें खुलीं, जरा गौर कीजिए। परीक्षा हुई तो प्रश्न पत्रों में बेशुमार गल्तियां उजागर हुईं। फिर मॉडल आंसर-की आई। उस पर भारी आपत्तियां उठीं। फिर उसे हटाया गया। नई आंसर-की जारी हुई। फिर भी गल्तियां पूरी तरह दुरुस्त नहीं हुईं। रिजल्ट आया तो कट-ऑफ का कुछ अता-पता नहीं। ओएमआर पर सवाल खड़े हुए। मेरिट लिस्ट पर सदस्यों ने सिग्नेचर तक नहीं किया। और अब मामला सीआईडी जांच तक पहुंच चुका है। कल सीआईडी ने जेपीएससी और एजेंसी के दफ्तरों पर छापेमारी की। कंप्यूटर जब्त हुए। सर्वर जब्त हुए। हार्ड डिस्क जब्त हुईं। ओएमआर रिकॉर्ड जब्त हुए। डिजिटल फॉरेंसिक जांच चल रही है। कई लोग हिरासत में हैं, कई से पूछताछ हो रही है। जांच अपना काम करेगी, दोषी कौन है, यह अदालत तय करेगी। लेकिन सवाल इससे बड़ा है।
जेपीएससी मेन्स की तारीख घोषित हो चुकी है। हजारों छात्र दिन-रात तैयारी कर रहे हैं। अब पूरी परीक्षा पर अनिश्चितता का साया मंडरा रहा है। सिविल जज भर्ती परीक्षा सालों तक विवादों और अदालतों में उलझी रही। अब जाकर मेन्स परीक्षा लेने का रास्ता साफ हुआ था कि एक नया विवाद सामने आ गया। एपीओ भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा दिसंबर में हुई, परिणाम छह महीने बाद आया, आगे का भविष्य अब भी अधर में है। आखिर झारखंड में कोई भर्ती प्रक्रिया बिना किसी ग्रहण के पूरी क्यों नहीं होती? आज भाजपा जेपीएससी का घेराव कर रही है। कल कोई और करेगा। परसों शायद छात्र अकेले सड़क पर उतरेंगे। राजनीति बदलती रहेगी। सरकारें भी आती-जाती रहेंगी। लेकिन अगर जेपीएससी और जेएसएससी का चरित्र नहीं बदला…तो सबसे बड़ा नुकसान किसी राजनीतिक दल का नहीं होगा। नुकसान झारखंड के लाखों युवाओं का होगा।
एक कड़वा सच और। जेपीएससी की स्थापना से लेकर आज तक, चेयरमैन से लेकर मेंबर्स तक की नियुक्तियों में उनकी राजनीतिक निष्ठाओं, पहुंच और रिश्तों को तरजीह दी जाती रही है। जब आयोग का नेतृत्व ही राजनीतिक वफादारी और रसूख के आधार पर तय होगा… तो ऐसे आयोग से निष्पक्षता, पारदर्शिता और ईमानदारी की उम्मीद का प्रतिशत कितना होगा? क्या कोई है जो युवाओं के भरोसे की चोरी की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार है? या फिर अगली भर्ती, अगला विवाद और अगली जांच आने तक सब कुछ फिर सामान्य मान लिया जाएगा?
लेखक रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार हैं।


