
- सुशोभित
राहुल गांधी में कुछ तो बात है! कल सुबह ना केवल उन्होंने आईसा की युवा लड़कियों के साथ पत्रकारों को सम्बोधित किया, बल्कि अपनी बात रखने के बाद उन्होंने छात्राओं से पूछा कि क्या आप भी कुछ कहना चाहेंगी और नेहा के आगे बढ़ने पर चुपचाप किनारे जाकर खड़े हो गए और अपने मंच से उन्हें बोलने दिया। अ परफ़ेक्ट जेंटलमैन!
राहुल में कोई इनसिक्योरिटीज़ नहीं हैं- ना पुरुष होने की, ना प्रिविलेज्ड होने की, ना लीडर ऑफ़ अपोजिशन होने की, ना क़द्दावर होने की।
उन्हें यह असुरक्षा भी नहीं सताती कि अपने मंच से कम्युनिस्ट छात्र नेताओं को बोलने का अवसर देकर कहीं वो अपनी राजनैतिक पूँजी तो नहीं गँवा देंगे। ध्यान रहे कि केरल में कम्युनिस्टों से कांग्रेस की प्रतिद्वंद्विता है। अलबत्ता आईसा जिस कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएमएल) की स्टूडेंट विंग है, वो केरल में एलडीएफ़ का हिस्सा नहीं है।
इसकी तुलना कॉकरोच जनता पार्टी के युवाओं के साथ प्रेस-वार्ता कर रहे बीजेपी के जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह से करें, जिनके चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई थीं, मानो अछूतों के साथ एक जाजम पर बैठना पड़ रहा हो!
कम-ऑन, आप इन ऑप्टिक्स को कब तक अनदेखा करते रहेंगे? अंतर स्पष्ट है। एक तरफ़ भ्रष्ट, कुलीन, विशेषाधिकार-प्राप्त तंत्र है, दूसरी तरफ़ संघर्ष हैं, सपने हैं, ठेठ जनवादी राजनीति है। एक तरफ़ हाकिम है, दूसरी तरफ़ अवाम। इनके बीच हमेशा टकराव रहा है। और लोकतंत्र में हाकिम अवाम को अपने जूते की नोक पर रखकर ज़्यादा दिन नहीं टिक सकता।
राजनीति कोई वैसा इको-चैम्बर नहीं है, जिसकी चमचमाती चारदीवारी के भीतर बैठकर आप उन्हीं आंदोलनकारियों को ‘फ्रेंड्स’ कहते हुए घटिया रीलें जारी करें, जिन पर अभी चार दिन पहले लाठियाँ बरसा रहे थे और अब हवा का रुख़ बदलते देख सुर बदल लिए हों। राजनीति के लिए आपको लोगों के बीच जाना पड़ता है, सड़कों पर उतरना पड़ता है, धूप-बारिश को सहना होता है और जनता से सीधे संवाद करना होता है। अगर आप यह नहीं कर सकते तो राजनीति आपके लिए नहीं है। वो देर-सबेर आपको हाशिये पर धकेल देगी। जैसा कि राहुल गांधी ने कहा : “जो बीत चुका हो, वो कभी भी आने वाले कल से लड़ाई नहीं लड़ सकता!”
और नेहा? क्या ओजस्वी चेहरा है! कैसी प्रखरता, संघर्ष का कैसा माद्दा, विचारों में कैसी स्पष्टता है! बहुत दिनों के बाद वामधारा से ऐसी कोई युवा आवाज़ प्रकट हुई है, जिसे सार्वजनिक जीवन में बहुत लम्बा सफ़र तय करना है। हम कालान्तर में नेहा को भारत की शिक्षा मंत्री के रूप में देखना चाहेंगे! क्यों नहीं? हम कब तक इन बूढ़े, थके, चुके हुए, अप्रासंगिक, बासी चेहरों को झेलते रहेंगे? हमें अपनी राजनीति में नए विचार, नई ऊर्जा, नए चेहरे चाहिए।
देश में कम्युनिस्ट-राजनीति आज रसातल में है और पिछले 50 सालों में यह पहली बार है, जब किसी भी राज्य में कोई कम्युनिस्ट-सरकार नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी का सम्बल युवा कम्युनिस्ट नेताओं के लिए मायने रखता है। उनके पास आवाज़ है, राहुल उन्हें व्यापक मंच मुहैया कराते हैं। यह अकारण नहीं है कि दिल्ली की वामपंथी छात्र-राजनीति से निकले कन्हैया कुमार भी अंतत: कांग्रेस में सम्मिलित हो गए थे।
इस आंदोलन की प्रेरणा भले ही सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके रहे हों- और उन्हें उनके श्रेय से वंचित नहीं किया जा सकता- किन्तु युवा छात्रों की ऊर्जा ने ही उसे एक दूसरे स्तर पर पहुँचाया था और यह राहुल की राजनैतिक सूझबूझ भी थी, जो उन्होंने उसके मोमेंटम को समझा और अपनी निष्ठा को उसमें मिला दिया।
कभी-कभी मंच से पीछे हटकर भी आप केन्द्रीय नायक बन जाते हैं- यह हमें राहुल ने सिखाया है!

