
रांची : हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष संजय सर्राफ ने कहा है कि राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन राष्ट्रभाषा हिंदी के अमर प्रहरी थे। उनकी जयंती प्रत्येक वर्ष 1 अगस्त को पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। इस दिन राष्ट्र उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान, भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण तथा राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार में किए गए अद्वितीय कार्यों को स्मरण करता है। वे ऐसे महान राष्ट्रनायक थे जिन्होंने आजीवन सत्य, सादगी, स्वदेशी और भारतीय मूल्यों को अपने जीवन का आधार बनाया। उनके उत्कृष्ट व्यक्तित्व और त्यागमय जीवन के कारण उन्हें सम्मानपूर्वक “राजर्षि” की उपाधि से अलंकृत किया गया। पुरुषोत्तम दास टंडन का जन्म 1 अगस्त 1882 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ था।
उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की तथा कुछ समय तक वकालत भी की। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन सहित अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भाग लिया और कई बार कारावास भी भोगा।पुरुषोत्तम दास टंडन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में रहे तथा वर्ष 1950 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए। वे हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाने के लिए निरंतर संघर्षरत रहे। संविधान सभा में उन्होंने पूरे दृढ़ संकल्प के साथ हिंदी के पक्ष में अपनी बात रखी। उनके अथक प्रयासों के कारण हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान मिला।
वे मानते थे कि अपनी भाषा ही किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान और आत्मगौरव की सबसे बड़ी आधारशिला होती है। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती का उद्देश्य नई पीढ़ी को देशभक्ति, राष्ट्रभाषा के सम्मान, भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा नैतिक जीवन के प्रति प्रेरित करना है। इस अवसर पर विद्यालयों, महाविद्यालयों, सरकारी संस्थानों तथा सामाजिक संगठनों द्वारा संगोष्ठियों, विचार गोष्ठियों, भाषण प्रतियोगिताओं और हिंदी साहित्य से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
उनके राष्ट्र निर्माण में दिए गए अमूल्य योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1961 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया। 1 जुलाई 1962 को उनका निधन हो गया, किंतु उनके विचार, आदर्श और राष्ट्रभाषा के प्रति समर्पण आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती हमें यह संदेश देती है कि राष्ट्र की उन्नति अपनी भाषा, संस्कृति, स्वाभिमान और राष्ट्रीय एकता के संरक्षण से ही संभव है।

