झारखंड में हीमोफीलिया मरीजों के लिए जीवनरक्षक दवाओं का संकट, सरकारी अस्पतालों में फैक्टर-8 और 9 का स्टॉक खत्म

Archana Ekka
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रांची : झारखंड में हीमोफीलिया के मरीजों के लिए एक बड़ी और गंभीर समस्या सामने आई है। रिम्स और रांची के सदर अस्पताल समेत कई जिलों के सरकारी अस्पतालों में पिछले दो-तीन महीनों से फैक्टर-8 और फैक्टर-9 जैसी कई जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। इन जिलों में चतरा, हजारीबाग, रामगढ़, पलामू, गढ़वा, धनबाद, गोड्डा, जमशेदपुर और चाईबासा शामिल हैं।

अस्पतालों में दवाइयों की आपूर्ति नहीं होने के कारण मरीजों को दवा दुकानों से महंगे दामों में दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं या वे ब्लीडिंग के जानलेवा जोखिम का सामना करने को मजबूर हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह कोई सामान्य दवा नहीं है। अगर यह दवा समय पर नहीं मिले, तो बच्चों में छोटी-सी चोट भी गंभीर हो सकती है।

एक्टिविस्ट संतोष जायसवाल ने आरोप लगाया कि दवा सप्लाई करने वाली एजेंसी की लापरवाही से राज्य के सभी डे-केयर सेंटरों में स्टॉक खत्म हो गया है। मरीज अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन मिल रहा है। उन्होंने जिम्मेदार एजेंसी पर कार्रवाई की मांग की।

लहू बोलेगा संस्था के संस्थापक नदीम खान ने बताया कि सरकारी व्यवस्था प्रभावित होने से मरीजों को हर महीने करीब 20 हजार रुपये की दवा खुद खरीदनी पड़ रही है। यहां तक कि आयरन की गोलियां भी बाहर से लेनी पड़ रही हैं। राज्य में रक्त विकार से पीड़ित करीब 20 हजार मरीज हैं, लेकिन अब तक उनका पूरा सर्वे नहीं हो सका है। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पी.के. चौधरी के अनुसार, फैक्टर-8 और फैक्टर-9 खून में पाए जाने वाले जरूरी प्रोटीन हैं, जो चोट लगने पर खून का बहना रोकने में मदद करते हैं।

 

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।