
रांची: अगस्त क्रांति पर रांची सुलग उठी थी। इस क्रांति में सबसे बड़ी बात कि युवाओं ने भरपूर साथ दिया था। स्कूल-कालेज के छात्रों ने भाग लिया था। नौंवी में पढ़ने वाले जिला स्कूल के छात्रों ने काफी संख्या में भाग लिया था। इसके साथ रांची और आसपास के टाना भगतों ने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जीवन भर अहिंसा का पालन करने वाले टाना भगत हिंसक हो गए थे। टेलीफोन तार काट दिए थे। रेल की पटरियां उखाड़ दी गई थीं। अरगोड़ा स्टेशन को फूंक दिया गया था। नौ अगस्त से लेकर 18 अगस्त रांची धधकता रहा। रांची में नौ अगस्त को हड़ताल की गई थी। शाम को जिला कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में तालाबंदी कर दी गई। इसके बाद लोगों की सभा हुई, जिसमें काफी संख्या में छात्र-नौजवान भी शामिल हुए। शहर के पुराने क्रांतिकारी रहे डा. यदुगोपाल मुखर्जी को पकड़ लिया गया। रामरक्ष उपाध्याय, नारायणजी, नंदकिशोर भगत, नागेश्वर प्रसाद भी गिरफ्तार कर लिए गए। दस को नारायण चंद्र लाहिड़ी भी पकड़ लिए गए। अतुल चंद्र मित्र को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस कलकत्ता पहुंची। अतुल बाबू वहां अपना इलाज करवा रहे थे। पुलिस की आंखों में धूल झोंक वे 10 अगस्त की रात रांची पहुंचे और कार्यकर्ताओं से मिलकर उन्हें अगस्त आंदोलन का कार्यक्रम बताया। इस बीच पटना में गोलीकांड हो गया तो उसकी खबर रांची भी पहुंची। यहां छात्र काफी आवेश में आ गए और रांची जिला स्कूल के छात्रों ने स्थानीय विद्यालय में हड़ताल करवा दी। जिला स्कूल के छात्र आंदोलन में कूद गए थे। 14-15 अगस्त को जुलूस निकाला। 17 को मामला अधिक गंभीर हो उठा। विद्यार्थियों ने स्कूल-कालेज छोड़कर कहीं हिंसात्मक तो कहीं शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू कर दिया। यहां के पुलिस अधिकारियों ने बड़ी होशियारी से काम लिया।
उन्होंने प्रदर्शन करने वालों पर डंडा नहीं चलाया और न सरकारी इमारतों पर झंडा फहराने के काम में किसी भी प्रकार का दखल दिया। परिणाम यह हुआ कि शहर की जागरूक जनता झंडे फहराकर वापस लौट गई। सरकारी इमारतों पर थोड़ी बहुत जगह जहां ताले लगाए गए थे, पुलिस अधिकारियों की प्रार्थना और इस आश्वासन पर कि वे आजाद सरकार की आज्ञानुसार कार्य करने को तैयार हैं, खोल दिए गए। मांडर, कुडूं, चैनपुर, बेड़ो, बिशुनपुर जैसे सुदूर इलाकों में भी थानों पर टाना भगतों ने झंडे फहराए। कुंडू को छोड़कर बाकी सबमें ताला लगा दिया गया। युवाओं के जोश ने अहिंसा को पीछे छोड़ दिया और अरगोड़ा रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर दिया। रांची और लोहरदगा के बीच की रेलवे लाइन उखाड़ दी गई। रांची हवाई अड्डे, लोहरदगा के फौजी कैंप, रांची की पोस्ट आफिस एवं ग्रीष्मकालीन सचिवालय पर भी तोड़-फोड़ की गई। तार काटने का काम कोकर में किया गया, तब यह गांव ही था। जिला स्कूल के भूगोल विभाग को भी 18 अगस्त को आग के हवाले कर दिया।
रांची जेल के सामने जुलूस पहुंचा तो अंदर बंद छात्रों ने जेल तोड़ कर बाहर निकलने की चेष्टा की, किंतु बाहर से पूरी सहायता न मिलने तथा अन्य कैदियों के बाधा उपस्थित करने से एक फाटक पार करने पर उन्हें रोक दिया गया। बाद में जेल में लाठी चार्ज हो गया, जिसमें शहर के सबसे धनी परिवार के लड़के आत्माराम बुधिया को गहरी चोट आई। संताल परगना भी अगस्त क्रांति की लपटों से अछूता न रहा। देवघर, दुमका, गोड्डा, जामताड़ा, करमाटाड़, राजमहल, साहिबगंज आदि स्थानों पर जनता ने जुलूस निकाले। झंडा फहाराया। यहां 600 व्यक्ति गिरफ्तार किए गए, जिनमें 200 आदिवासी थे। इस जिले में छह लोग गोली के शिकार हुए और 20 जेलों में मर गए। यहां पर कई लोगों को 35 साल तक की सजाएं हुईं। जब देश आजाद हुआ तो रांची की पहाड़ी मंदिर पर तिरंगा फहराया गया।

