
अनूप नारायण सिंह
पटना : आज समय जानने के लिए मोबाइल की स्क्रीन पर नजर डालना काफी है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब पटना के बड़े इलाके में रहने वाले लोग घड़ी देखने के साथ-साथ उसकी आवाज भी सुना करते थे। सचिवालय परिसर में खड़ा ऐतिहासिक घंटाघर सिर्फ पटना की पहचान नहीं था, बल्कि गर्दनीबाग से लेकर चितकोहरा तक फैले सरकारी क्वार्टरों की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था। रात के सन्नाटे में जब उसकी घंटियां गूंजतीं तो लोगों को समय का एहसास होता था।1990 से 2020 तक गर्दनीबाग में रहने के दौरान इस घंटाघर की आवाज रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही। रोड नंबर-1 से लेकर चितकोहरा तक सरकारी आवासों से भरे इस इलाके में सुबह सरकारी कर्मचारियों के दफ्तर जाने से शुरू होती और शाम को उनके लौटने के साथ धीरे-धीरे शांत होने लगती। इस पूरे माहौल में सचिवालय का घंटाघर दूर खड़ा समय का प्रहरी नजर आता था।
वॉच टावर नहीं, ऐतिहासिक क्लॉक टावर
आम बोलचाल में पटना सचिवालय के इस टावर को भले ही ‘वॉच टावर’ कहा जाता रहा हो, लेकिन इसका वास्तविक स्वरूप ऐतिहासिक क्लॉक टावर यानी घंटाघर का है। सचिवालय भवन का निर्माण 1913 से 1917 के बीच हुआ था। इसका डिजाइन न्यूज़ीलैंड में जन्मे वास्तुकार जोसेफ फियरिस मुनिंग्स ने तैयार किया था। भवन निर्माण का जिम्मा कलकत्ता की प्रसिद्ध मार्टिन बर्न एंड कंपनी को दिया गया था। टावर की मूल ऊंचाई करीब 198 फीट थी। वर्ष 1934 में बिहार में आए विनाशकारी भूकंप में इसका ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद इसकी ऊंचाई घटकर लगभग 184 फीट रह गई।
1924 में लगी थी घड़ी
सचिवालय भवन बनने के कुछ वर्षों बाद वर्ष 1924 में इस टावर पर घड़ी लगाई गई। इसे इंग्लैंड के क्रॉयडन की प्रसिद्ध कंपनी Gillett & Johnston ने बनाया था। उस दौर में यह कंपनी टावर क्लॉक और घंटियों के निर्माण के लिए जानी जाती थी।यही घड़ी बाद के दशकों में पटना सचिवालय की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। इसकी घंटियों की आवाज आसपास के इलाके में सुनाई देती थी। गर्दनीबाग के सरकारी क्वार्टरों में रहने वाले लोगों के लिए यह आवाज समय के साथ-साथ जीवन की गतिविधियों का भी संकेत देती थी।
सरकारी क्वार्टरों की जिंदगी से जुड़ी थी आवाज
गर्दनीबाग का इलाका लंबे समय तक सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों की बड़ी बस्ती के रूप में जाना जाता रहा है। रोड नंबर-1 से लेकर चितकोहरा तक बने सरकारी क्वार्टरों में अलग-अलग विभागों में काम करने वाले कर्मचारी और अधिकारी रहते थे। सुबह साइकिल और स्कूटर से कार्यालय जाने वालों की भीड़, स्कूल जाते बच्चे, बाजार की हलचल और शाम को कार्यालय से लौटते कर्मचारियों के बीच सचिवालय का घंटाघर इस इलाके की एक स्थायी पहचान था।रात में जब चारों ओर सन्नाटा गहराने लगता, तब दूर सचिवालय की ओर से आती घंटियों की आवाज खास तौर पर सुनाई देती थी। उस समय हर घर में मोबाइल फोन या डिजिटल घड़ी नहीं हुआ करती थी। ऐसे में सार्वजनिक स्थानों पर लगी बड़ी घड़ियां लोगों की दिनचर्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
एक इमारत नहीं, बदलते पटना का गवाह
सचिवालय का यह घंटाघर सिर्फ समय बताने वाली व्यवस्था नहीं रहा। यह पटना के बदलते इतिहास का भी मूक गवाह है। ब्रिटिश काल में बने सचिवालय परिसर ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से लेकर स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था तक अनेक बदलाव देखे हैं। 1934 के भूकंप का झटका झेलने के बाद भी टावर अपनी पहचान के साथ खड़ा रहा।दशकों बाद पटना की तस्वीर बदल गई। शहर में ऊंची इमारतें आईं, यातायात बढ़ा, संचार के साधन बदले और लोगों की समय देखने की आदत भी बदल गई। मोबाइल और डिजिटल घड़ियों के दौर में सार्वजनिक घंटाघरों की भूमिका भले कम हो गई हो, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लिए सचिवालय का घंटाघर आज भी यादों का हिस्सा है।गर्दनीबाग में बीते तीन दशकों की स्मृतियों में उस घंटाघर की आवाज आज भी कहीं न कहीं सुनाई देती है—टन… टन… टन…।यह सिर्फ समय की आवाज नहीं थी।यह उस पटना की आवाज थी, जो अब धीरे-धीरे इतिहास और स्मृतियों में बदल चुका है।

