रांची: भारतीय ज्ञान परंपरा दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध परंपराओं में से एक रही है। ज्ञान को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया गया है और आज के दौर में इसी परंपरा को आधुनिक तकनीक, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के साथ जोड़ने की जरूरत है। यह बात रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय ने मंगलवार को कही। वह रांची विश्वविद्यालय के मदन मोहन मालवीय मिशन ट्रेनिंग कॉलेज की ओर से आयोजित 14 दिवसीय पुनश्चर्या पाठ्यक्रम में संसाधन सेवी के रूप में बोल रहे थे। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तु ने करीब 2600 वर्ष पहले मनुष्य की चार मौलिक जरूरतों के रूप में भोजन, वस्त्र, आवास और शिक्षा का उल्लेख किया था। गणना में शिक्षा भले चौथे स्थान पर हो, लेकिन गुणवत्ता और महत्व के लिहाज से उसका स्थान सबसे ऊपर है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान का महत्व समझाया था। गीता के चौथे अध्याय के 38वें श्लोक में कहा गया है-

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत् स्वयं योग संसिद्धि कालेनात्मनि विन्दति।
अर्थात इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि ज्ञान स्वयं को पवित्र करता है और दूसरों को भी पवित्र करने की क्षमता रखता है। गीता में ज्ञान प्राप्ति के लिए श्रद्धा, तत्परता और इंद्रिय संयम को महत्वपूर्ण बताया गया है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में ज्ञान को सर्वोच्च स्थान
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा में ज्ञान का स्थान हमेशा सर्वोच्च रहा है और आगे भी रहेगा। उन्होंने संस्कृत, वेद और भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसी ज्ञान की बदौलत भारत को कभी विश्व गुरु की संज्ञा दी गई थी। उन्होंने सिकंदर और उसके गुरु अरस्तु से जुड़ा प्रसंग भी सुनाया। उनके अनुसार, जब सिकंदर विश्व विजय के अभियान पर निकल रहा था, तब उसने अरस्तु से भारत से उनके लिए उपहार लाने की बात कही। अरस्तु ने भारत से एक संत-गुरु लाने की इच्छा जताई। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि यह प्रसंग भारतीय ज्ञान और संत परंपरा के महत्व को रेखांकित करता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा वैदिक काल से लगातार आगे बढ़ती रही है। ‘आचार्य देवो भव’, ‘मातृ देवो भव’, ‘पितृ देवो भव’, ‘अतिथि देवो भव’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसे विचार इसकी मूल भावना को दर्शाते हैं। भारतीय परंपरा में केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीने की भावना पर भी जोर दिया गया है। पंचतंत्र के श्लोक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा-
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।
उन्होंने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा मूल्य और नैतिकता पर आधारित रही है। हालांकि, आज शिक्षा का स्वरूप काफी हद तक व्यावसायिक और रोजगार केंद्रित हो गया है। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि, वेद व्यास, भवभूति, कालिदास, पाणिनि, सूर, तुलसी, कबीर, जायसी से लेकर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर तक की रचनाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा की झलक मिलती है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा आगे भी गंगा की तरह निरंतर प्रवाहित होती रहेगी।
भारतीय ज्ञान परंपरा में नारी का भी महत्वपूर्ण स्थान
डॉ. पाण्डेय ने भारतीय ज्ञान परंपरा में नारी के स्थान पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि नारी माता, पत्नी और पुत्री के रूप में परिवार और समाज की आधारशिला है। उसके बिना सृष्टि की कल्पना अधूरी है। वह केवल भोग्या नहीं, बल्कि सहधर्मिणी और सहयोगिनी है। उन्होंने जयशंकर प्रसाद की कामायनी के श्रद्धा सर्ग का उल्लेख करते हुए कहा-
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग पग तल में।
पीयूष स्त्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुंदर समतल में।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में नारी के सम्मान और उसकी भूमिका को हमेशा महत्व दिया गया है।
वेद एक हाथ में, कंप्यूटर दूसरे हाथ में
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बात करते हुए डॉ. पाण्डेय ने इसे ऐसी तकनीक बताया, जो मशीनों को मानव जैसी तर्क शक्ति और स्वायत्त निर्णय लेने की क्षमता प्रदर्शित करने में सक्षम बनाती है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. जॉन मैकार्थी को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जनक माना जाता है। उनका जन्म 4 सितंबर 1927 को बोस्टन, मैसाचुसेट्स में हुआ था और 24 अक्टूबर 2011 को अमेरिका में उनका निधन हुआ। वर्ष 1956 में डार्टमाउथ कॉलेज के एक सम्मेलन में उन्होंने ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ शब्द का इस्तेमाल किया था। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारत में भी NEP 2020 के संदर्भ में AI की चर्चा काफी बढ़ी है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के विकसित भारत के 2047 के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि युवाओं में जोश और बुजुर्गों में अनुभव का मेल देश को आगे ले जा सकता है। उनके अनुसार, युवाओं के एक हाथ में वेद और दूसरे हाथ में कंप्यूटर होना चाहिए। वेद भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रतीक हैं, जबकि कंप्यूटर और मोबाइल कृत्रिम मेधा के प्रतीक हैं। विकसित भारत के लिए दोनों के बीच समन्वय जरूरी है।
गुरु की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
डॉ. पाण्डेय ने भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है और गुरु का सम्मान भारतीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। उन्होंने तुलसीदास की पंक्तियों का उल्लेख किया।
गुरु बिनु भव निधि तरै न कोई।
जो विरंचि शंकर सम होई।
उन्होंने संत कबीर की प्रसिद्ध पंक्तियों के जरिए भी गुरु की महिमा बताई-
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो मिलाय।
मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु की कृपा के बिना निर्गुण की प्राप्ति संभव नहीं मानी गई है।
भारतीय ज्ञान परंपरा समावेशी और समन्वयवादी
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा समावेशी और समन्वयवादी रही है। कृत्रिम मेधा 21वीं सदी की देन है, लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल भाषा या विषय का ज्ञान हासिल करना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण भी रहा है। उन्होंने अंग्रेजी की प्रसिद्ध कहावत का उल्लेख किया-
When wealth is lost nothing is lost,
Health is lost, something is lost,
But when character is lost, everything is lost.
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा स्वार्थ के बजाय परमार्थ की भावना पर जोर देती है। जड़ और चेतन में ईश्वर की उपस्थिति तथा त्यागपूर्वक भोग की भावना इसके प्रमुख विचारों में शामिल हैं। ईशावास्योपनिषद् के प्रथम श्लोक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा-
ईशावास्यमिदं सर्वं, यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
उन्होंने कहा कि गुरु और शिष्य का रिश्ता भारतीय परंपरा में पिता-पुत्र जैसा माना गया है। शिक्षक अपने ज्ञान के जरिए विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डॉ. पाण्डेय ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में 14 विद्याओं और 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है। आज जरूरत है कि इनका संबंध कृत्रिम मेधा के साथ स्थापित किया जाए।
आदर्श शिक्षक में होने चाहिए ये 7 गुण
डॉ. पाण्डेय ने आदर्श शिक्षक की कसौटी पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षक के लिए सात प्रमुख गुण बताए गए हैं-
विद्वत्वं, दक्षता, शीलं, संक्रान्तिरनुशीलनम्।
शिक्षकस्य गुणाः सप्त, सचेतस्त्वं प्रसन्नता।
उन्होंने बताया कि एक आदर्श शिक्षक में विद्वता, योग्यता, आचारशीलता, संप्रेषणीयता, अभ्यास, जागरूकता और प्रसन्नता जैसे गुण होने चाहिए। उन्होंने निष्कर्ष के रूप में कहा कि विकसित भारत और विश्व गुरु बनने के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा और कृत्रिम मेधा का समन्वय जरूरी है। दोनों एक-दूसरे के सहयोग से विकास और उन्नति का रास्ता मजबूत कर सकते हैं। अंत में उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों का उल्लेख किया।
विद्या, कला, कौशल्य में सबका अटल अनुराग हो,
उद्योग का उन्माद हो, आलस्य-अघ का त्याग हो।
सुख और दुख में एक सा सब भाइयों का भाग हो,
अंतःकरण में गूंजता राष्ट्रीयता का राग हो।
कार्यक्रम में विभिन्न प्रांतों के विभिन्न विश्वविद्यालयों और अलग-अलग विषयों से कुल 41 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। डॉ. जेबी पाण्डेय ने समन्वयक डॉ. आरएस डे और डॉ. बीके मंडल को गीता की प्रति भेंट कर सम्मानित किया। आगत अतिथियों का स्वागत योगदा कॉलेज के अंग्रेजी के प्राध्यापक एवं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. आरएस डे ने किया। कार्यक्रम का संचालन संत जेवियर्स कॉलेज के हिंदी प्राध्यापक डॉ. संजय कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन करीम सिटी कॉलेज के हिंदी प्राध्यापक डॉ. सुभाष चंद्र गुप्ता ने किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान और शांतिपाठ के साथ हुआ।


