
नई दिल्ली : देश का दिग्गज औद्योगिक घराना, टाटा समूह (Tata Group) बड़े परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है। क्योंकि, 125 साल पुराने इस इंडस्ट्रियल ग्रुप में अब सत्ता और शासन का ट्रांसफर होने जा रहा है। 12 अगस्त को एन चंद्रशेखरन (N Chandrashekhran) के टाटा संस के चेयरमैन पद से इस्तीफे के एलान के बाद अब यह तय माना जा रहा है कि टाटा समूह पर पूर्ण नियंत्रण नोएल टाटा का होने जा रहा है। पिछले कई सालों से नोएल टाटा, रतन टाटा के दौर में रहकर चुपचाप काम करते रहे। जहां, रतन ने बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए बड़े और ग्लोबल दांव खेले, वहीं नोएल ने मुनाफ़े पर ध्यान देने और प्राइवेट-लेबल के ज़रिए ‘ट्रेंट’ (Trent) को एक रिटेल पावरहाउस बना दिया।
एन चंद्रशेखरन के इस्तीफे के बाद अब नोएल टाटा कॉर्पोरेट जगत में सबसे ऊंचे ओहदे पर पहुंच गए हैं, जिसके कयास साल 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद से लगाए जाने लगे थे। रतन टाटा के जाने के बाद टाटा समूह में नेतृत्व को लेकर नोएल टाटा और एन चंद्रशेखरन के बीच गतिरोध बना रहा है। हालांकि, अब यह गतिरोध एन चंद्रशेखरन के इस्तीफे के बाद ही खत्म हो गया है।
एन. चंद्रशेखरन के टाटा संस में तीसरा कार्यकाल न लेने के फ़ैसले के साथ नोएल टाटा ने इस समूह में सर्वोच्च अधिकारी के तौर पर अपनी भूमिका मज़बूती से स्थापित कर ली है। 12 नवंबर 1956 को सिमोन और नवल टाटा के घर जन्मे नोएल ने UK में नेस्ले (Nestlé) में काम शुरू करने से पहले ससेक्स यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की। भारत लौटने के बाद, उन्होंने टाटा इंटरनेशनल में कई साल बिताए और फिर 1999 में ट्रेंट (Trent) की कमान संभाली। उनकी देखरेख में, बेंगलुरु का एक अकेला स्टोर बढ़कर वेस्टसाइड (Westside) के नेतृत्व वाला कई हज़ार करोड़ का रिटेल साम्राज्य बन गया।

