रांची: झारखंड में डूबने से होने वाली मौत को लेकर कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। डूबने से होने वाली मौत को गंभीर मुद्दा मानते हुए इसके स्थायी समाधान की दिशा में पहला राज्यस्तरीय कदम उठाया गया है।

होटल चाणक्य बीएनआर में नेशनल हेल्थ मिशन झारखंड और ‘चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट’ (सिनी) द्वारा ‘स्टेट-लेवल कंसल्टेशन ऑन ड्राउनिंग प्रिवेंशन’ का आयोजन किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य डूबने की घटनाओं को रोकने के लिए तैयारी, जोखिम प्रबंधन और विभिन्न सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना था।
समीक्षा के दौरान पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार मई से जुलाई 2025 के बीच राज्य में डूबने से 161 लोगों की जान गई है, जो प्रतिदिन औसतन दो मौतों को दर्शाता है। इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए विशेषज्ञों और अधिकारियों ने कहा कि दुर्घटना के बाद राहत कार्य चलाने से बेहतर है कि दुर्घटना होने ही न दी जाए। इसके लिए जोखिम वाले हॉटस्पॉट्स को चिन्हित करने, जल स्रोतों को बैरियर लगाकर सुरक्षित बनाने, प्राथमिक बचाव उपकरण तैनात करने और समुदाय को जागरूक करने की जरूरत है।
समारोह में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव ए सिद्दीकी ने नदियों, झरनों और पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा मानकों को कड़ाई से लागू करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर जगह पुलिस की तैनाती संभव नहीं है, इसलिए सामुदायिक भागीदारी और प्रत्येक विभाग की जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं एनएचएम झारखंड के मिशन निदेशक शशि प्रकाश झा ने उच्च जोखिम वाले स्नान घाटों और झरनों पर स्थायी सुरक्षा रस्सियां व बैरियर नेट लगाने का सुझाव दिया, ताकि डूबते व्यक्ति को सहारा मिल सके।
एनएचएम के नोडल अधिकारी डॉ. कमलेश कुमार ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था ‘ग्राउंड जीरो’ से ही शुरू करनी होगी क्योंकि दुर्घटना के बाद अस्पताल पर निर्भर रहना बहुत देर हो जाने जैसा है। इस सम्मेलन में भारत सरकार, डब्ल्यूएचओ और ब्रिटेन की संस्था आरएनएलआई (RNLI) के विशेषज्ञों ने ऑनलाइन जुड़कर अपने तकनीकी अनुभव साझा किए।
साथ ही स्वास्थ्य विभाग, आपदा प्रबंधन, यूनिसेफ, जेएसएलपीएस, पिरामल फाउंडेशन और सीआईएनआई (सिनी) समेत दर्जनों गैर-सरकारी व विकास संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
साथ ही ‘झारखंड स्टेट एक्शन फ्रेमवर्क फॉर ड्राउनिंग प्रिवेंशन’ तैयार करने का प्रस्ताव पास किया गया। इसके तहत बहु-विभागीय कार्य समूह का गठन किया जाएगा, जो राज्यभर में डूबने की घटनाओं की निगरानी, मौसम आधारित तैयारी, सामुदायिक प्रशिक्षण और सुरक्षा बैरियर लगाने जैसे कार्यों को जमीन पर उतारेगा।


