

दयानंद राय





सत्ताधीशों के सामने चुनौतियां कोई नई बात नहीं है। लगभग हर सरकार और राजनेता को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में आज नजर डालते हैं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झामुमो के सामने आनेवाली चुनौतियों पर। पहले बात मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सामने आनेवाली चुनौतियों पर। तो छात्र आंदोलन और उसके बाद के घटे घटनाक्रम ने सरकार की साख पर सवाल उठाएं हैं। हालांकि, हेमंत सोरेन ने छात्र आंदोलन को बखूबी मैनेज किया लेकिन सरकार के दामन पर दाग लग ही गया। झामुमो महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य की पत्नी जो जेपीएससी में सदस्य हैं उनके पीए पर पैसे लेने के आरोप लगे। सुप्रियो भट्टाचार्य पार्टी महासचिव रहे हैं और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भी करीब रहे हैं। सुप्रियो भट्टाचार्य ने इन आरोपों का खंडन नहीं किया और साइलेंट हो गए। वे प्रेस कांफ्रेंसेज का हिस्सा भी नहीं बन रहे हैं ऐसे में आरोपों को और बल मिला।
छात्र आंदोलन के बाद दूसरी चुनौती मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सामने मीडिया के सरकार के प्रति रवैये से उपजी है। मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के दिन पत्रकारों को प्रोजेक्ट भवन के भीतर जाने की अनुमति नहीं दी गयी। नाराज पत्रकारों ने कैबिनेट की बैठक का बहिष्कार किया। बाद में सरकार के मंत्री आए और पत्रकारों से माफी मांगी। क्या इस समस्या का पहले ही समाधान नहीं हो सकता था। क्या सरकार का अपना सूचना तंत्र इतना फिसड्डी हो चुका है कि उसे आनेवाली चुनौतियों की भनक नहीं रही। आखिर प्रोजेक्ट भवन में पत्रकारों की इंट्री पर किसने रोक लगायी और उससे सरकार को क्या हासिल हुआ। पॉजिटिव कुछ हासिल नहीं हुआ पर मुफ्त में नकारात्मक प्रचार हुआ। सरकार को एक बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि मीडिया पर बैन उसकी मुसीबतें और बढ़ायेगा कम नहीं करेगा। अब आते हैं तीसरी चुनौती पर। एमएमडीआर विधेयक झारखंड के लिए बहुत ही नुकसानदायक विधेयक है और अगर यह मौजूदा स्वरुप में लागू हुआ तो इससे झारखंड को बड़ा नुकसान होगा। सरकार को खनिजों पर सेस के रुप में जो राशि मिलती है वह अरबों की राशि सरकार को मिलनी बंद हो जाएगी। सरकार को पुरजोर तरीके से इस मुद्दे को उठाना चाहिए था पर सरकार के पास प्रभावी प्रवक्ताओं का अकाल है। सुप्रियो भट्टाचार्य जैसे सीजंड प्रवक्ता जहां साइलेंट मोड में चल रहे हैं वहीं डॉ तनुज खत्री जैसे फायरब्रांड प्रवक्ता अब सूचना आयुक्त बन चुके हैं। विनोद पांडेय प्रवक्ता हैं लेकिन सिर्फ उससे काम नहीं चलेगा। पार्टी के पास और भी प्रवक्ता हैं लेकिन उनमें कितनी ताकत है और कितना प्रभाव है यह सबको पता है।
इन चुनौतियों से कैसे निपट सकती है सरकार
सरकार को सबसे पहले प्रभावी मीडिया मैनेजमेंट की दिशा में कदम उठाना चाहिए। पत्रकार प्रतिनिधियों से बात करके प्रोजेक्ट भवन में इंट्री पर लगी रोक अविलंब हटवानी चाहिए। सरकार इस दिशा में सोच रही है यह अच्छी बात है लेकिन यह काम जल्दी से जल्दी होना चाहिए। छात्र आंदोलन के गतिरोध को शांत करने की दिशा में सरकार ठीक दिशा में आगे गयी है लेकिन अब परीक्षा सिस्टम को फूल प्रूफ बनाने की जरूरत है। छात्रों का डिगा भरोसा पुन: बहाल करने की जरूरत है। सरकार को यह मान लेना चाहिए कि उसके पास अच्छे प्रवक्ताओं की कमी है और इस कमी को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए। डॉ तनुज खत्री के सूचना आयुक्त बन जाने के बाद उनके जैसा युवा और प्रभावी प्रवक्ता झामुमो को हर हालत में चाहिए। सुप्रियो भट्टाचार्य चाहे जिस वजह से साइलेंट हो उनकी अनुपस्थिति में उनके जैसा ही एक अनुभवी प्रवक्ता और चाहिए जो मीडिया में पार्टी और सरकार का रुख अच्छी तरह रख सके। इतना तो तय है कि केवल विनोद पांडेय और अन्य प्रवक्ता सरकार का पक्ष रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
झामुमो के सामने चुनौतियां क्या हैं
यह निर्विवाद है कि झामुमो एक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी है और उसका राष्ट्रीय फलक पर विस्तार पार्टी के लिए जरूरी है। लेकिन यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा इसका कोई विजन पार्टी के पास फिलहाल नहीं है। झामुमो कार्यकर्ताओं को भी अन्य पार्टियों के कार्यकर्ताओं की तरह प्रशिक्षण और पार्टी का रोडमैप बताने की जरूरत है लेकिन इस दिशा में प्रयास कम ही हो रहे हैं। यह तय है कि झामुमो आगे तब ही बढ़ेगी जब झारखंड में उसकी पकड़ मजबूत रहे और इसके साथ ही पार्टी को जहां और जिन राज्यों में विस्तार करना है वहां लगातार काम हो। असम में पार्टी ने चुनाव लड़ा था। चुनाव के दौरान वहां थोड़ी सुगबुगाहट दिखी पर सब ठंडा पड़ गया। यह अच्छा संकेत नहीं है। जहां पार्टी विस्तार करना चाहती है वहां उसे अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को एक्टिव रखना होगा। झामुमो का कैडर बेस भरोसेमंद है लेकिन उसे और प्रभावी किए जाने की जरूरत है। झामुमो को एसआइआर के बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या घटने से उपजे असर से भी निपटना है। इसे हल्के में लेना पार्टी के लिए ठीक नहीं होगा। इसी एसआइआर ने बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सत्ता से हटने पर मजबूर कर दिया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जब राज्य में सत्ता संभाली थी तब उन्होंने कहा था कि उन्हें बुक नहीं बुके दिया जाए। मुख्यमंत्री को जो बुक मिले उनका क्या हुआ, यह किसी ने पूछा नहीं है पर सरकार को बताना चाहिए।
लास्ट में एक बात जनता कुछ भी भूलती नहीं है भले ही सत्ताधीश भूल जाएं।
