

प्रभात मिश्रा





कल्पतरु, जिसके बारे में मान्यता है कि यह देववृक्ष है और इसकी उत्पति समुद्र मंथन से हुई थी। आज यह दुर्लभ वृक्षों की श्रेणी में है। एक बार रांची के पत्रकार प्रो. प्रकाश सहाय ने फेसबुक पर पुरानी मेमोरी शेयर की थी और रांची में कल्पतरु की व्यथा पर 2002 में छपी रिपोर्ट साझा की थी। उन्होंने इसकी जानकारी देने के लिए वन विभाग के पूर्व अधिकारी श्री नरेंद्र मिश्रा का आभार जताया था। इस पर उन्होंने झारखंड में चार और वृक्ष होने की टिप्पणी की थी। जब मेरे मित्र कौशिक मल्लिक ने अन्य चार के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि इनमें से दो डालटनगंज में हैं।
डालटनगंज का नाम आने से मेरे अंदर उत्सुकता जगी। सौभाग्य से श्री मिश्रा मेरे रिश्तेदार भी हैं। मैंने उनसे जानकारी चाही तो उन्होंने बताया कि इनमें से एक स्टेशन रोड में और दूसरा बेलवाटीकर में है। हालांकि कौशिक के अनुसार इनकी संख्या तीन है। उसके अनुसार एक बेलवाटिका चौक पर, दूसरा स्टेशन रोड में पानी टंकी के पीछे और तीसरा आनंद मार्ग स्कूल के पास है। मैंने भी अपने शहर में इनकी संख्या तीन ही पाई है।पहली तस्वीर बेलवाटिका चौक और दूसरी आनंद मार्ग स्कूल के पास की है। इनमें मेरे साथ मेरी बहन रश्मि, मेहमान कृति भूषण मिश्रा और भतीजा मानस हैं। यह तस्वीर इस साल मार्च की है। पर्यावरण के क्षेत्र में कार्यरत संस्था सेसा इसके संरक्षण के लिए प्रयासरत है। मैंने कल्पतरु का एक वृक्ष पत्रकार सतीश सुमन के औरंगाबाद के गांव परता में भी देखा है।
हम डालटनगंज के लोगों के लिए भी यह जरूरी है कि हम इस वृक्ष की महत्ता को जाने, इसे देखें और इसके संरक्षण के लिए आगे आए हैं। मेरे जैसे कई लोग हैं यह जिन्हें यह जानकारी ही नहीं है कि उनके गृहनगर में एक ऐसी धरोहर भी है। इसका वानस्पतिक नाम अदानसोनिया डिजिटेटा (Adansonia digitata) है।
