

नई दिल्ली: नेपाल में बुधवार को अचानक आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि इसने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों को समझने और उनसे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए ग्लेशियरों का व्यवस्थित वैज्ञानिक आकलन करने व बेहतर भूमि उपयोग नीति बनाने की जरूरत को रेखांकित किया है। इस बाढ़ से नेपाल और तिब्बत में अब तक 460 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि भारतीय पर्यटकों समेत हजारों लोग लापता हैं। बाढ़ ने कई शहरों और गांवों में भारी तबाही मचाई, प्रमुख पुलों को बहा दिया और करीब एक दर्जन जलविद्युत परियोजनाओं को ठप कर दिया। नेपाल-तिब्बत सीमा पर रसुवागढ़ी के पास बुधवार को अचानक जलस्तर बढ़ने के बाद शुरुआती तौर पर आशंका जताई गई थी कि बाढ़ की वजह ग्लेशियर झील का फटना (जीएलओएफ) या हिमस्खलन हो सकती है।





हालांकि, काठमांडू स्थित अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) के शोधकर्ता अब यह पता लगाने में जुटे हैं कि क्या अत्यधिक ऊंचाई से बर्फ और चट्टानों का भारी मलबा खिसककर नीचे आने की घटना इस बाढ़ की वजह बनी। प्रभावित इलाकों के वीडियो और अन्य उपलब्ध जानकारी के प्रारंभिक अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि संभवत: बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा भोटे कोशी नदी की सहायक ल्हेंदे खोला में गिरा होगा जिससे पानी, मलबे और बड़े-बड़े पत्थरों का तेज बहाव निचले इलाकों की ओर आया। आईसीआईएमओडी के वरिष्ठ हिममंडल विशेषज्ञ और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर के एसोसिएट प्रोफेसर मोहम्मद फारूक आजम ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि यह घटना जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हो सकती है। उन्होंने कहा कि बर्फ का आवरण घट रहा है, ग्लेशियर खिसक रहे हैं और अधिक चट्टानी तथा बंजर जमीन उभर रही है, जो ज्यादा गर्मी सोखती है। इससे पहाड़ों की ढलानें अस्थिर हो सकती हैं।
आजम ने कहा कि घटना का सटीक कारण अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन कम होते बर्फ आवरण, सिकुड़ते ग्लेशियर और क्षेत्र में स्थायी रूप से जमी बर्फ की परत यानी ‘परमाफ्रॉस्ट’ का पिघलना इसमें योगदान दे सकता है। ‘ग्लोबल एंड प्लैनेटरी चेंज’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, हिमालय में अत्यधिक बर्फबारी जैसी घटनाएं बर्फ के संचय को केवल कुछ समय के लिए बढ़ाती हैं। वहीं, ‘जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी: रीजनल स्टडीज’ में प्रकाशित हालिया अध्ययन के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन के कारण हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की संख्या 1990 से 2024 के बीच 525 प्रतिशत बढ़ी, जबकि उनका कुल क्षेत्रफल दोगुना हो गया। छोटी झीलों की संख्या नौ से बढ़कर 487 हो गई।
आईआईटी रोपड़ के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख एवं एसोसिएट प्रोफेसर रीत कमल तिवारी ने कहा, ‘‘ग्लेशियर झीलें अलग-अलग प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बन सकती हैं और उन्हें हिमोढ़, ग्लेशियर की बर्फ, चट्टानी गड्ढों या अन्य भू-आकृतियों से बने अवरोध रोक सकते हैं।’’ उन्होंने कहा कि केवल ग्लेशियर झील का होना अपने आप में आसपास के लोगों के लिए तत्काल खतरे का संकेत नहीं है। पहले यह आकलन जरूरी है कि झील कितनी अस्थिर है और किन बाहरी कारणों से अचानक पानी का तेज बहाव शुरू हो सकता है। असली चिंता बढ़ती झीलों के साथ बढ़ते खतरे और निचले इलाकों में बढ़ती आबादी का मेल है। तिवारी के अनुसार, संभावित खतरों में भूस्खलन, मूसलाधार बारिश, बर्फ और चट्टानों का खिसकना, चट्टानों का गिरना तथा ग्लेशियरों का टूटना शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय की शोधकर्ता सोनिया रिजाल ने कहा कि केवल बारिश पर आधारित चेतावनी व्यवस्था भी इस आपदा की गंभीरता बढ़ाने वाला एक कारण हो सकती है। उन्होंने कहा कि प्रभावित घाटियों में लोगों ने पानी आने से पहले एक-दूसरे को सचेत किया, लेकिन भारी बारिश नहीं होने के कारण कई लोगों ने इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया।
आजम ने कहा कि हिमालय में उपलब्ध आंकड़े बेहद सीमित हैं। इसलिए आंकड़ों और जमीनी स्तर की समझ को बेहतर बनाने के साथ हिमालय के लिए विशेष मॉडल तथा कम लागत वाली पूर्व चेतावनी प्रणालियां विकसित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में हुई तबाही भी इससे मिलती-जुलती थी। उस समय एक चोटी से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिस्सा टूटकर गिरा था, जिससे ऋषिगंगा, धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों में अचानक बाढ़ आ गई थी। जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ था और करीब 300 लोग मारे गए या लापता हो गए थे। आजम ने कहा, ‘‘हर आपदा का स्वरूप अलग होता है। पहले हमें उसके पीछे की प्रक्रिया को समझना होगा और फिर उसी के अनुरूप बचाव तथा नुकसान कम करने के उपाय तय करने होंगे।’’
तिवारी ने कहा कि सबसे पहले संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियर झीलों और उनके निचले इलाकों का वैज्ञानिक आकलन किया जाना चाहिए जिसमें झील और उसके बांध के साथ आसपास के क्षेत्र, संभावित कारण, पानी के बहाव के रास्ते तथा प्रभावित होने वाली मानव बस्तियों और बुनियादी ढांचे की भी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके लिए ग्लेशियर विज्ञान, भूविज्ञान, जलविज्ञान, उपग्रह आधारित निगरानी और आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए। आजम ने कहा कि इस बाढ़ ने भूमि उपयोग की स्पष्ट नीति बनाने की जरूरत भी सामने ला दी है।
उन्होंने कहा, ‘‘समस्या यह है कि हम नदियों के बहुत करीब और कई बार उनके रास्ते में ही बस्तियां बसा रहे हैं। बस्तियों और बुनियादी ढांचे के विकास की उचित योजना जरूरी है, क्योंकि ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और पिछले कुछ दशकों में इन घटनाओं की संख्या तथा तीव्रता बढ़ी है।’’ उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन की व्यवस्था को भी नए सिरे से देखने की जरूरत है। आजम ने कहा कि अब यह भी आकलन होना चाहिए कि बाढ़, बादल फटने या ग्लेशियर झील के फटने जैसी घटनाओं का मौजूदा बस्तियों और बुनियादी ढांचे पर क्या असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल इस तरह का व्यापक आकलन उपलब्ध नहीं है।
