


रांची: झारखंड में हर दिन 6 लोग सुसाइड अटेम्प्ट ले रहे हैं। जिससे समझा जा सकता है की किस कदर लोग मानसिक रूप से बीमार हो चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। ऐसे में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग राज्य में मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर दो प्रमुख अभियान चलाने जा रहा है। 10 से 16 सितंबर तक राज्यभर में आत्महत्या रोकथाम सप्ताह मनाया जा रहा है, जिसका थीम ‘आत्महत्या पर सोच और बातचीत का नजरिया बदलना’ रखा गया है।





इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और आत्महत्या के विचारों को व्यक्तिगत विफलता या सामाजिक कलंक मानने के बजाय एक चिकित्सीय स्थिति के रूप में स्वीकार करना और त्वरित सहायता प्रदान करना है। इसके साथ ही 11 सितंबर को आईपीएच में लैंगिक हिंसा और पॉश (POSH) अधिनियम पर राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें महिला स्वास्थ्य कर्मियों के सम्मान और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन झारखंड के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने स्पष्ट किया है कि राज्य के सभी 24 जिलों के सदर अस्पतालों में ‘मन-कक्ष’ और प्रखंड स्तर के आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से निःशुल्क परामर्श और दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। संकट से जूझ रहे लोगों के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 14416 (टेली-मानस) 24 घंटे कार्यरत है, जिस पर पीड़ित व्यक्ति की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है। इस व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए सीआईपी कांके और रिन्पास जैसे प्रमुख संस्थान तकनीकी सहयोग दे रहे हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं जैसे नागपुरी, खोरठा और संथाली में काउंसलिंग की सुविधा दी गई है, जबकि ग्रामीण स्तर पर सहिया बहनों, एएनएम और सीएचओ को गेटकीपर के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है। मीडिया से भी अपील की गई है कि वे आत्महत्या की खबरों को सनसनीखेज न बनाएं और हमेशा हेल्पलाइन नंबर 14416 का उल्लेख करें।
उन्होंने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए विभाग ने ‘शून्य सहनशीलता’ (जीरो टॉलरेंस) की नीति अपनाई है। स्वास्थ्य विभाग में लगभग 70 प्रतिशत महिला कर्मी कार्यरत हैं, जिनमें नियमित, संविदा, आउटसोर्स, दैनिक वेतनभोगी कर्मी और कंसल्टेंट शामिल हैं। इन सभी को ‘पॉश’ अधिनियम 2013 के तहत समान कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है। कार्यस्थल की परिभाषा को केवल कार्यालय तक सीमित न रखकर फील्ड विजिट, अस्पताल वार्ड, एम्बुलेंस और डिजिटल माध्यमों तक विस्तारित किया गया है।
यौन उत्पीड़न की शिकायतों के निष्पक्ष निवारण के लिए राज्य स्तरीय 7-सदस्यीय आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का पुनर्गठन किया गया है, जिसमें पारदर्शिता के लिए यूनिसेफ और आईसीआरडब्ल्यू के स्वतंत्र विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। शिकायत दर्ज करने के लिए भारत सरकार के ऑनलाइन पोर्टल ‘शी-बॉक्स’ का भी उपयोग किया जा सकता है। पीड़िता के साथ किसी भी प्रकार के प्रतिशोध या नौकरी से निकालने जैसी कार्रवाई को रोकने के लिए कठोर एंटी-रिटेलिएशन नियम लागू किए गए हैं, जिसके तहत दोषी अधिकारी पर सीधे दंडात्मक कार्रवाई होगी। समिति को जांच के दौरान आरोपी या पीड़िता के तबादले और अतिरिक्त अवकाश जैसी अंतरिम राहत देने का अधिकार है तथा उसकी सिफारिशों पर प्रशासनिक और आपराधिक कार्रवाई अनिवार्य रूप से की जाएगी।
