राजस्थान के थार में पहली बार सिस्तान सैंड बोआ की मौजूदगी मिली, सीकर में मिले तीन सांप

राजस्थान के थार क्षेत्र में शोधकर्ताओं ने पहली बार भारत में 'सिस्तान सैंड बोआ' सांप की प्रमाणित मौजूदगी दर्ज की है, जिसके सीकर और चूरू जिलों से तीन जीवित नमूने मिले हैं।

Razi Ahmad
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जयपुर: राजस्थान के थार क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन में भारत में पहली बार सिस्तान सैंड बोआ की प्रमाणित मौजूदगी सामने आई है और शोधकर्ताओं ने प्रदेश के सीकर जिले के रामगढ़-शेखावाटी क्षेत्र से इस प्रजाति के तीन जीवित सांपों का दस्तावेजीकरण किया है।

यह अध्ययन ‘जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा’ में 26 मई 2026 को प्रकाशित हुआ। इसे जबलपुर के सांप शोधकर्ता विवेक शर्मा और रणथंभौर की टाइगर वॉच संस्था से जुड़े वन्यजीव वैज्ञानिक धर्मेंद्र खांडल ने किया है।

दोनों शोधकर्ताओं ने वर्ष 2025 में सीकर और चूरू जिलों में सर्वेक्षण किया। इस दौरान सीकर के आसपास सिस्तान सैंड बोआ के तीन सांप मिले। पहला सांप 19 अगस्त 2025 को एक गौशाला में मिला। दूसरा 12 सितंबर 2025 को सुंडा की ढाणी में एक स्थानीय घर के आंगन में मिला, जबकि तीसरा 21 सितंबर 2025 को रुकनसर के बाहरी इलाके में निर्माणाधीन मकान के पास ईंटों के ढेर में मिला।

शोधकर्ताओं ने बताया कि तीनों सांप अलग-अलग उम्र के थे। उनके रंग, शरीर की बनावट और शल्कों की विशेषताओं का विस्तार से अध्ययन किया गया। इन आकृति और गणनीय विशेषताओं की तुलना के आधार पर तीनों की पहचान सिस्तान सैंड बोआ के रूप में की गई।

खांडल ने बताया कि सिस्तान सैंड बोआ का शरीर मजबूत और बेलनाकार होता है। कम उम्र में इसकी पीठ का रंग हल्का पीला-भूरा, जबकि उपवयस्क और वयस्क अवस्था में टैन या भूरा दिखाई देता है। इसके शरीर पर गहरे रंग की पट्टियां होती हैं, जो इसे आम तौर पर पाए जाने वाले रेड सैंड बोआ से अलग पहचानने में मदद करती हैं।

अध्ययन के अनुसार, सिस्तान सैंड बोआ की पूंछ आधार से धीरे-धीरे पतली होती जाती है और अंत में नुकीली हो जाती है। इसके विपरीत रेड सैंड बोआ की पूंछ काफी हिस्से तक लगभग समान मोटाई की रहती है और अंत में पतली होती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, वे राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में पिछले करीब एक दशक से इस तरह के सांपों को देख रहे थे।

हालांकि, पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होने के कारण पहले इसकी पहचान नहीं की जा सकी थी। पिछले वर्षों में राजस्थान के कम से कम 40 स्थानों से ऐसे सांपों की तस्वीरें मिली थीं, लेकिन केवल तस्वीरों के आधार पर प्रजाति की पुष्टि संभव नहीं थी।

अध्ययन में कहा गया है कि रंग-रूप, व्यवहार, शरीर की बनावट और अन्य जैविक विशेषताओं के वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर इसकी पहचान की गई।

खांडल ने कहा, “हमें पता था कि यह सांप अलग है, लेकिन हमने जल्दबाजी में इस पर शोध पत्र नहीं लिखा। पहले हमने इसे ठीक से समझने और इसका अध्ययन करने का फैसला किया।”

उन्होंने बताया कि उन्होंने 2003 और 2006 में चूरू जिले के लिलकी क्षेत्र में ऐसे सांपों की तस्वीरें खींची थीं, लेकिन उस समय उनकी सही प्रजाति की पहचान नहीं हो सकी थी।

शोधकर्ताओं के अनुसार, सिस्तान सैंड बोआ को लंबे समय तक रेड सैंड बोआ की उप-प्रजाति माना जाता था। वर्ष 2020 में ईरान में प्रकाशित एक वर्गीकरण अध्ययन में आकृति और आनुवंशिक प्रमाणों के आधार पर इसे अलग प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई।

उन्होंने बताया कि राजस्थान में यह प्रजाति केवल रेत के टीलों वाले क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि खेतों, बागानों और अन्य मानवीय गतिविधियों वाले इलाकों में भी देखी गई है।

शोधकर्ताओं ने इसके अवैध व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों में इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि इसे कुछ स्थानों पर “दो-मुंहा सांप” के नाम से गलत तरीके से प्रचारित किया जाता है।

उन्होंने इस प्रजाति की वास्तविक वितरण सीमा, आबादी और संरक्षण स्थिति को समझने के लिए आगे अध्ययन की जरूरत बताई।

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रजी अहमद एक उभरते हुए कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो वर्षों का अनुभव है। उन्होंने न्यूज़ अरोमा में काम करते हुए विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपनी लेखन शैली को मजबूत बनाया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंटेंट राइटिंग, न्यूज़ लेखन और मीडिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं में अच्छा अनुभव हासिल किया। वह लगातार सीखते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं।