रांची: रांची विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय कुँड़ुख़ विभाग में गुरुवार को “कुँड़ुख़ साहित्य के विकास में नाटक की भूमिका” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल से आए कुँड़ुख़ साहित्यकार विमल कुमार टोप्पो और रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के पूर्व समन्वयक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. हरि उराँव ने अपने विचार साझा किए।

व्याख्यान के दौरान विमल कुमार टोप्पो ने अपने साहित्यिक सृजन और कुँड़ुख़ नाट्य परंपरा पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने ‘कोड़ा राजी’, ‘दई बोंगा उढ़ारी परदेस’, ‘खी़री झुम्पा’ और ‘चुन्नु-मुन्नु’ जैसी रचनाओं के माध्यम से कुँड़ुख़ समाज के जीवन-संघर्ष, सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक सरोकारों को रेखांकित किया।
उन्होंने चाह-बागानों की ओर हुए पलायन तथा झारखंड और पश्चिम बंगाल में कुँड़ुख़ समुदाय की सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति को साहित्य के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि नाटक जैसी साहित्यिक विधाएं समाज के अनुभवों, संघर्षों और सांस्कृतिक पहचान को प्रभावी ढंग से सामने लाने का माध्यम बन सकती हैं।
कार्यक्रम में कुँड़ुख़ भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। इस दौरान भाषा के संरक्षण, संवर्धन और संवैधानिक मान्यता की दिशा में निरंतर साहित्य-सृजन, पुस्तकों के प्रकाशन और शोध कार्यों की महत्ता पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने कुँड़ुख़ साहित्य को समृद्ध बनाने में रचनात्मक लेखन और नाट्य परंपरा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय कुँड़ुख़ विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बन्दे खलखो ने व्याख्याताओं और उपस्थित प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इसके साथ ही उन्होंने कार्यक्रम के समापन की घोषणा की। मंच संचालन शोधार्थी जगदीश उराँव ने किया।
इस अवसर पर शोधार्थी कृष्णा उराँव, दुलारी कुमारी, पूजा कुमारी, समिया कुमारी, पूजय उराँव, दीपक उराँव, मंजू कुमारी सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का उद्देश्य कुँड़ुख़ साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने, नाटक के माध्यम से समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करने और भाषा के संरक्षण एवं विकास के लिए साहित्यिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना रहा।


