दशहरा अहंकार, अन्याय और बुराइयों को त्यागने का देता है संदेश, विजयादशमी पर आत्ममंथन और सदाचार अपनाने का आह्वान

रांची: श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट एवं विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने दशहरा यानी विजयादशमी को सत्य, धर्म और सदाचार की विजय का महापर्व बताया है। उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में इस पर्व का विशेष महत्व है। दशहरा बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय की विजय का संदेश देता है।
संजय सर्राफ ने कहा कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी मनाई जाती है। यह पर्व शारदीय नवरात्र के समापन के साथ देशभर में श्रद्धा, उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर विभिन्न स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठान, रामलीला, मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
भगवान श्रीराम की विजय का प्रतीक है दशहरा
रामायण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए संजय सर्राफ ने कहा कि लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था। माता सीता को मुक्त कराने के लिए भगवान श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव, हनुमानजी और वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की। युद्ध में भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर अधर्म का अंत किया और माता सीता को मुक्त कराया। इसी विजय की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है।
उन्होंने कहा कि दशहरे के अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में रामलीला का मंचन किया जाता है और रावण, मेघनाद तथा कुंभकर्ण के पुतलों का दहन होता है। यह परंपरा मनुष्य को अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और द्वेष जैसी बुराइयों का त्याग करने की प्रेरणा देती है।
मां दुर्गा की विजय से भी जुड़ा है विजयादशमी का पर्व
संजय सर्राफ ने कहा कि विजयादशमी का संबंध मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए मां दुर्गा ने नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका संहार किया। इस कारण विजयादशमी को शक्ति, साहस और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।
उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में यह पर्व दुर्गापूजा के समापन और मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ मनाया जाता है।
शस्त्र पूजन और नए कार्यों के शुभारंभ की परंपरा
विजयादशमी के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इस दिन भगवान श्रीराम, मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर शस्त्र पूजन, वाहन पूजन और औजारों की पूजा करने की परंपरा है। किसान अपनी कृषि सामग्री, व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों और कारीगर अपने उपकरणों का पूजन करते हैं। शमी वृक्ष की पूजा भी इस पर्व की महत्वपूर्ण परंपराओं में शामिल है।
मान्यता है कि विजयादशमी के दिन नए कार्यों की शुरुआत करना शुभ होता है। इसी कारण कई लोग इस अवसर पर नए कार्यों का संकल्प लेते हैं और धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में भाग लेते हैं।
बुराइयों पर विजय प्राप्त करना ही दशहरे का वास्तविक संदेश
संजय सर्राफ ने कहा कि दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आत्मशुद्धि का अवसर भी है। रावण के दस सिर मनुष्य को अपने भीतर मौजूद अहंकार और अन्य दुर्गुणों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं। वहीं, भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सत्य और आदर्श आचरण का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि यह पर्व समाज में प्रेम, सद्भाव, एकता और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने की प्रेरणा देता है। परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों की अंततः विजय होती है।
संजय सर्राफ ने विजयादशमी के अवसर पर लोगों से अपने भीतर की बुराइयों को त्यागने और समाज में सदाचार, मानवता तथा सकारात्मकता का प्रसार करने का संकल्प लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि यही विजयादशमी की वास्तविक सार्थकता और जीवन का सच्चा संदेश है।


