पुष्यमित्र
नीचे तीन स्क्रीनशॉट हैं। इन्हें देखिये। इनमें एक दिल्ली से दरभंगा रूट की है, दूसरी सूरत से छपरा और तीसरी बांद्रा से दानापुर। दोनों में एक रेगुलर ट्रेन है, एक स्पेशल. दोनों के किराया का अंतर भी देखिये और रनिंग टाइम का भी।


दिल्ली से दरभंगा रूट में अगर आपको संपर्क क्रांति का एसी-3 का टिकट मिल जाता है तो आप 1520 रुपये चुकाकर लगभग 21 घंटे में दरभंगा पहुंच जायेंगे। पर अगर आप फेस्टिव स्पेशल से आते हैं तो किराया तीन सौ रुपये अधिक लगेगा और वक्त लगभग पांच घंटे अधिक। वह भी अगर ट्रेन समय से पहुंचा दे, क्योंकि स्पेशल ट्रेनों का समय से पहुंच जाना दुर्लभ घटना होती है।
अब इसे सूरत से छपरा वाली ट्रेनों के उदाहरण से समझें। ताप्ती गंगा का थर्ड एसी का किराया 1905 रुपये है और यह 31 घंटे 38 मिनट में पहुंचाती है। पर स्पेशल ट्रेन इसी रूट में 350 रुपये अधिक लेकर दो घंटे देरी से पहुंचाने का वादा करती है। मगर जहां ताप्ती गंगा कल राइट टाइम पहुंची, वहीं स्पेशल अपनी पिछली यात्रा में 3.30 घंटे लेट पहुंची। मतलब आपने 350 रुपये अधिक चुकाये और आप 5.30 घंटे देरी से पहुंचे।

अब बांद्रा से दानापुर का हाल देखिये, किराया लगभग चार सौ रुपये अधिक और सफर आठ घंटे अधिक का।
यह त्योहरों के मौके पर रेलवे द्वारा चलाये जा रहे स्पेशल ट्रेनों का हाल है। रेलवे इन्हें पूरी गैरजिम्मेदारी से चलाती है। अक्सर खुलती ही देर से है, पहुंचती तो देर से है ही, रनिंग टाइम भी बढ़ाकर रखती है कि ज्यादा लेटलतीफी समझ न आये। इसके बावजूद वह यात्रियों से स्पेशल ट्रनों का किराया अधिक वसूलती है।
इस बार आधिकारिक जानकारी यह है कि बिहार के लिये रेलवे 67 जोड़ी स्पेशल ट्रेनें चला रही हैं। पिछले साल अधिक ट्रेनों थीं, क्योंकि बिहार में चुनाव थे। इस बार ट्रेनें कम हैं, इसलिए आप देखेंगे कि अधिक किराया और कम सुविधाओं के बावजूद स्पेशल ट्रेनों में भी सीटें नहीं मिल रहीं।
आखिर इनका किराया अधिक क्यों है।
इसका जवाब रेलवे अलग-अलग तरह से देती है। कहा जाता है कि ये ट्रेनें एक तरफ से खाली रहती हैं, डिब्बों का अरेंजमेंट करना पड़ता है, वगैरह-वगैरह। मगर यात्री जो रेलवे का उपभोक्ता भी है, उसके अधिकारों का क्या? वह क्यों अधिक किराया चुकाकर असुविधा भोगेगा। किराया अधिक लेते हैं तो इन्हें प्रीमियम ट्रेनों की तरह ट्रीट कीजिये।
क्यों रेल यात्री 30 से 40 फीसदी अधिक किराया चुकाये और चार से आठ घंटे, कई दफा बारह घंटे की लेटलतीफी भी झेले। अभी तो इसकी बात भी नहीं हुई कि स्पेशल ट्रेनों में साफ-सफाई और सुविधाओं का कितना बुरा हाल रहता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


