30 साल बाद भारत में शुरू होगा नया दौर

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नई दिल्ली: आने वाले 30 साल बाद भारत का स्वरूप कैसा होगा क्या फिर पुरानी भारतीय परंपराओं पर जोर दिया जाएगा ऐसे ही कई विचारों और बातों को खंगालने को इसको लेकर साम गोल्डविन ने एक बार कहा था, ‘कभी भी भविष्यवाणी न करें, खासकर भविष्य के बारे में। ‘उन्होंने भविष्यवाणियों को बहुत गंभीरता से ले लिया था।

30 साल आगे की भविष्यवाणी का मकसद बेजान दारूवाला या बाबा रामदेव से बड़ा ज्योतिषी होने का दावा करना नहीं है बल्कि यह एक मस्ती है, कल्पना के संसार में उड़ान है। मैं भविष्यवाणी करता हूं कि 30 साल बाद भारत में 51 राज्य होंगे। नए राज्यों के गठन के लिए क्षेत्रीय दबाव बढ़ता जाएगा।

इस तरह भारत अमेरिका से आगे निकल जाएगा जहां 50 प्रांत हैं। इससे क्षेत्रीय दलों की संख्या में विस्फोटक तेजी आएगी।

पिछले 30 साल में कई क्षेत्रीय दल उभरे हैं जिनके बारे में हम 1991 में बहुत कम जानते थे। अगले 30 साल में यह प्रक्रिया और बढ़ेगी।

दर्जनों क्षेत्रीय दल अहम किरदार होंगे। इसका नतीजा यह होगा कि एक पार्टी का दबदबा खत्म हो जाएगा और गठबंधन का नया दौर शुरू होगा।

राष्ट्रीय चुनावों में बड़े राजनीतिक दलों का दबदबा नहीं रहेगा। चुनावों में सफल होने के लिए दर्जनों दलों के गठबंधन की जरूरत होगी।

हम पहले ही पिछले 30 साल में गठबंधन की राजनीति का दबदबा देख चुके हैं। 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी ने इस ट्रेंड को तोड़ा लेकिन यह फिर वापसी करेगा।

2019 के चुनावों में 20 दल बीजेपी के साथ साझेदार थे। हिन्दुत्व को झटका लगेगा।

सभी हिंदुओं को साथ लेने की बीजेपी की कोशिश नाकाम होगी क्योंकि जाति के नाम पर हर राज्य में छोटी पार्टियां उभरेंगी।

40 दलों के गठबंधन से बनी राष्ट्रीय सरकारें खुद को टुकड़े गठबंधन कहलाने में फख्र महसूस करेंगी।

सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की मांग इन क्षेत्रों में जोर पकड़ेगी। केवल हिंदुओं में ही 1600 जातियां हैं।

मुसलमानों और ईसाइयों में भी कई फिरके हैं। इसका फायदा उठाने के लिए उनमें होड़ बढ़ेगी और इस लक्ष्य को पाने के लिए वे छोटे दलों का गठन करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक आरक्षण का कोटा 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता है लेकिन इसकी धज्जियां उड़ाई जाएंगी। यह अनुपात बढ़कर 95 फीसदी हो जाएगा।

जो मेरिट की बात करेगा, उस पर अभिजात्य वर्ग का हितैषी होने का आरोप लगेगा। अगड़ी जाति वाले बेहतर रोजगार की तलाश में विदेश चले जाएंगे। दूसरे कहेंगे कि यह समाधान है, समस्या नहीं।

विदेशों में भारतवंशियों की आबादी 10 करोड़ पहुंच जाएगी। वे दुनिया की राजनीति और कारोबार में अहम पदों पर होंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति पंजाबी लहजे में और पोप मलयाली लहजे में बोलेंगे।

भारत की आबादी 1.6 अरब होगी और वह चीन से आगे निकल जाएगा। लेकिन फर्टिलिटी रेट घटकर 1.5 रह जाएगी और जीवन प्रत्याशा 95 साल हो जाएगी।

पहले सरकार का जोर छोटे परिवार पर था लेकिन तब उसकी कोशिश परिवार बढ़ाने की होगी। बहुविवाह की पुरानी भारतीय परंपराओं पर जोर दिया जाएगा।

नया नारा होगा, ‘हम पांच, हमारे पच्चीस।’ आर्थिक विकास की दर सालाना 4 फीसदी हो जाएगी। किसी भी देश में समृद्धि बढ़ने से जीडीपी की रफ्तार धीमी हो जाती है।

गठबंधन सरकारों का जोर पूरे देश की जीडीपी बढ़ाने के बजाय लोगों के बीच रेवडियां बांटने पर होगा। सब्सिडी बढ़कर जीडीपी का 10 फीसदी हो जाएगी।

इसका नतीजा यह होगा कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में बांग्लादेश भारत से आगे निकल जाएगा। बेहतर रोजगार की तलाश में भारत के लोग अवैध रूप से बांग्लादेश में घुसेंगे।

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