
डेस्क: कासगंज में सूरज प्रसाद डागा +2 विद्यालय में शिक्षकों के लिए एक खास संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें “आदर्श शिक्षक की कसौटी और अध्यापन कला” पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता विद्यालय के प्रबंधक संतोष माहेश्वरी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में रांची विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जंग बहादुर पाण्डेय ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षण सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक पवित्र जिम्मेदारी है। उनके अनुसार, परमात्मा उसी को यह दायित्व देता है जिस पर वह विशेष कृपा करता है। उन्होंने कहा कि एक शिक्षक की गोद में ही राष्ट्र का निर्माण, विकास और विनाश तीनों तय होते हैं।
उन्होंने तुलसीदास की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए गुरु के महत्व को रेखांकित किया-
“राखई गुरु जो कोप विधाता,
गुरु विरोध नहिं कोउ जग त्राता।” इसके बाद डॉ. पाण्डेय ने बताया कि एक आदर्श शिक्षक में सात खास गुण होने चाहिए:
विद्वत्व (ज्ञान): शिक्षक को अपने विषय की पूरी और गहरी जानकारी होनी चाहिए। बिना सही ज्ञान के अच्छा पढ़ाना संभव नहीं है।
दक्षता (समझदारी): सिर्फ जानकारी होना काफी नहीं, उसे सही तरीके से समझना और जीवन में लागू करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि दुनिया में जानकार बहुत हैं, लेकिन समझदार कम। जब ज्ञान और समझ एक साथ आते हैं, तभी दक्षता विकसित होती है।
शील (चरित्र): एक शिक्षक का आचरण और व्यवहार आदर्श होना चाहिए। चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है। इसी वजह से शिक्षक को ‘आचार्य’ कहा जाता है, यानी जिसका आचरण अनुकरणीय हो।
संक्रांति (संचार क्षमता): शिक्षक को अपनी बात विद्यार्थियों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाने की कला आनी चाहिए। इसे अंग्रेजी में ‘ट्रांसमिशन’ कहा जाता है।
अनुशीलन (अभ्यास): एक आदर्श शिक्षक अपने विषय का लगातार अभ्यास करता रहे। उन्होंने मानस की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान को बार-बार दोहराना जरूरी है।
सचेतनता (जागरूकता): शिक्षक को हमेशा सजग और सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए। अच्छी बातें कहीं से भी मिलें, उन्हें अपनाने की इच्छा होनी चाहिए।
प्रसन्नता (खुशमिजाजी): कक्षा में शिक्षक का व्यवहार सकारात्मक और खुशमिजाज होना चाहिए। इससे पढ़ाई का माहौल बेहतर बनता है और विद्यार्थी भी जुड़ाव महसूस करते हैं।
डॉ. पाण्डेय ने कालिदास के विचारों का भी जिक्र करते हुए कहा कि कुछ शिक्षकों में अनुभूति होती है और कुछ में अभिव्यक्ति, लेकिन जो शिक्षक दोनों में संतुलन रखते हैं, वही सबसे सफल होते हैं। इस अवसर पर डॉ. ज्योति स्वरूप अग्निहोत्री, डॉ. महेंद्र कुमार राय ‘रसिक’ और डॉ. लक्ष्मण लहरी ने भी अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संतोष माहेश्वरी ने कहा कि रांची से आए डॉ. पाण्डेय का मार्गदर्शन विद्यालय के लिए गर्व की बात है और इससे शिक्षकों को नई दिशा मिलेगी। कार्यक्रम में विद्यालय के सभी शिक्षक मौजूद रहे। अतिथियों का स्वागत प्राचार्य भूपेंद्र कुमार सिंह ने किया, जबकि संचालन हृदयेश कुमार द्विवेदी ने संभाला। अंत में उमेश सोलंकी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ और राष्ट्रगान के साथ हुआ।

