
कसमार: स्टेट हाईवे अथॉरिटी ऑफ झारखंड (SHAJ) के तहत बरलंगा–कसमार–नेमरा पथ के अंतर्गत कसमार प्रखंड के चौड़ा गांव से गोला प्रखंड के सुथरपुर जंगल तक अधूरी पड़ी सड़क के निर्माण कार्य ने फिर रफ्तार पकड़ ली है। पहाड़ी क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के बाद अब पहाड़ को समतल कर सड़क निर्माण का कार्य किया जा रहा है। सड़क पूरी होने के बाद बोकारो जिले के कसमार प्रखंड और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पैतृक गांव नेमरा के बीच सीधा सड़क संपर्क स्थापित हो जाएगा। वर्तमान में कसमार से गोला होते हुए नेमरा की दूरी लगभग 53 किलोमीटर है, जबकि नई सड़क बनने के बाद पिरगुल होकर यह दूरी घटकर 20–22 किलोमीटर रह जाएगी। यानी करीब 30 किलोमीटर की कमी आएगी। वहीं बोकारो से नेमरा की दूरी भी लगभग 100 किलोमीटर से घटकर करीब 60 किलोमीटर रह जाने का अनुमान है।
इस मार्ग के बनने से केवल कसमार और गोला प्रखंड ही नहीं, बल्कि बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, हजारीबाग, कोडरमा तथा दुमका की ओर से आने-जाने वाले लोगों के लिए भी नेमरा तक पहुंचना अधिक आसान हो जाएगा। टाटा, जमशेदपुर और चाईबासा की दिशा में आवागमन के लिए भी यह मार्ग एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक संपर्क उपलब्ध कराएगा।
इस सड़क का ऐतिहासिक महत्व भी बताया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष और धानकटनी आंदोलन के दौर में, जब दिशोम गुरु शिबू सोरेन प्रशासन की निगरानी से बचते हुए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, तब वे नेमरा से बरगा, सुथरपुर, चौड़ा, भस्की, बेलडीह और वनचास के घने जंगलों से होकर पैदल जैनामोड़ (बोकारो) तक आवाजाही करते थे। उस समय यह पूरा इलाका दुर्गम वन क्षेत्र था और यही रास्ता आंदोलन की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग माना जाता था।
स्थानीय बुजुर्गों का यह भी कहना है कि महाजनों की ओर से शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन की हत्या के बाद महाजनी प्रथा के विरुद्ध संघर्ष और धानकटनी आंदोलन ने झारखंड आंदोलन को नई दिशा दी। आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन और उनके परिवार ने जैनामोड़ (बोकारो) क्षेत्र में भी लंबे समय तक निवास किया। उस समय बोकारो से नेमरा जाने के लिए गोला या पश्चिम बंगाल के जयपुर–झालदा मार्ग का लंबा चक्कर लगाना पड़ता था।
ऐसे में स्थानीय लोगों का मानना है कि बरलंगा–कसमार–नेमरा सड़क केवल एक आधारभूत संरचना परियोजना नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन के इतिहास से जुड़े एक पुराने संपर्क मार्ग को आधुनिक स्वरूप देने वाली परियोजना भी है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए भी इस सड़क का विशेष महत्व माना जाता रहा है। यदि निर्माण कार्य निर्धारित समय पर पूरा होता है, तो यह सड़क क्षेत्रीय संपर्क, पर्यटन, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के साथ-साथ झारखंड आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े क्षेत्रों को भी नई पहचान दे सकती है।

