
लाहौर : पाकिस्तान के दो शिक्षाविदों ने 19वीं सदी के भारत के प्रमुख वास्तुकारों में से एक भाई राम सिंह के जीवन और योगदान का दस्तावेजीकरण किया है। शिक्षाविदों ने उन्हें पंजाब के सांस्कृतिक और वास्तुकला इतिहास में ‘एक अहम शख्सियत’ बताया। प्रोफेसर परवेज़ वंडल और प्रोफेसर साजिदा वंडल ने अपनी पुस्तक ‘द राज, लाहौर एंड भाई राम सिंह’ का एक ‘विशेष अमृतसर संस्करण’ प्रकाशित किया है। इस संस्करण में भाई राम सिंह की उल्लेखनीय यात्रा का वर्णन किया गया है, जिनके कार्यों ने स्वदेशी डिजाइन परंपराओं और औपनिवेशिक प्रभावों के बीच सेतु का काम किया। दोनों लेखकों ने कहा कि वास्तुकला, शिक्षा और शिल्प कौशल में उनका योगदान इस क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
साजिदा वंडल ने एक बयान में कहा, ‘भाई राम सिंह की विरासत ने विशेष रूप से लाहौर में कई प्रमुख संस्थानों और स्थापत्य स्थलों को आकार दिया, जिससे वह पंजाब के सांस्कृतिक और वास्तुकला इतिहास में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हुए।’ उन्होंने कहा कि ‘’द राज, लाहौर एंड भाई राम सिंह’ के अमृतसर संस्करण का विमोचन समारोह बुधवार को अमृतसर में आयोजित किया गया। वंडल ने बताया कि उन्होंने अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया और कम उम्र में ही अपनी प्रतिभा साबित कर दी।भाई राम सिंह (1858–1916) ब्रिटिश भारत के एक अग्रणी वास्तुकार और कुशल शिल्पकार थे, जिनकी उत्कृष्ट कृतियों ने लाहौर और पंजाब में ‘इंडो-सरासेनिक’ शैली को एक विशिष्ट पहचान दी। भाई राम सिंह पूर्वी पंजाब के रामगढ़िया परिवार से थे। भाई राम सिंह ने अंग्रेज इंजीनियरों और वास्तुकारों के साथ प्रतिस्पर्धा की और अपनी नवोन्मेषी डिज़ाइन और पैटर्न के लिए पहचान हासिल की।

