
अनुप नारायण सिंह
पटना के किसी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चले जाइए पटना से छपने वाले राष्ट्रीय अखबारों की तादाद उंगली पर गिन कर आठ है- जिसमें दो अंग्रेजी के अखबार है, विज्ञापन नीति अनुकूल होने के कारण आधा दर्जन उर्दू के अखबार भी पटना से छपते हैं। रीजनल चैनल में जी और न्यूज़ 18 दो ही चैनल है। इसके बाद की सारी मीडिया डिजिटल है। अगर यूट्यूब और फेसबुक वाले पत्रकार पॉलिटिकल पार्टियों के कार्यक्रम से लेकर पटना के अनेक कार्यक्रमों में नहीं आए तो मुश्किल से 10 पत्रकार भी नहीं पहुंच पाएंगे। अब डिजिटल का जो संसार है उसमें गिनती के बिहार के 10 चैनल हैं जो मिलियन के आगे जिनका नेचुरल व्यू है। उसके बाद स्वतंत्र युटुबर है जो मारधाड़ एक्शन से खबरें दिखाते हैं तो कमाई हो जाती है इसके बाद 70 फ़ीसदी डिजिटल के ऐसे पत्रकार हैं। जिनको फेसबुक यूट्यूब या किसी अन्य प्लेटफार्म से कोई कमाई नहीं होती फिर भी दिनभर खून पसीना बहाते पटना के पॉलिटिकल कार्यक्रमों में किसी प्रकार का कोई अनुदान इनको नहीं मिलता जो बड़े चैनल है उनको विज्ञापन के रूप में पॉलिटिकल पार्टियों जरूर समय-समय पर अपने पक्ष में करने की कोशिश करती है।
भीड़ जब से बड़ी है तब से पॉलिटिकल पार्टियों के प्रेस कॉन्फ्रेंस में चाय नाश्ता का भी प्रबंध समाप्त हो गया है सोचिए आज के युग में क्यों कोई अपना समय पैसा और संसाधन लगाकर दूसरे का प्रचार प्रसार करेगा। फिर भी यह लोग लगे रहते हैं इस आशा में कि उनका भी चैनल मोनेटाइज होगा बड़े डिजिटल चैनलों की तरह पॉलिटिकल कार्यक्रमों में उनकी भी पूछ होगी। बीजेपी और जन स्वराज दो ऐसी पॉलिटिकल पार्टियों है, जो डिजिटल के पत्रकारों को ज्यादा तवज्जो देती है। तीसरे नंबर पर राजद है चौथे नंबर पर जदयू और पांचवें नंबर पर कांग्रेस हालांकि अब तमाम पॉलिटिकल पार्टियों का अपना आईटी सेल है और वही निर्धारित करता है कि कौन सा डिजिटल चैनल उनके पार्टी के फेवर में खबर दिखाता है और कौन खिलाफ में।
बिहार की राजधानी पटना में आठ बड़े अखबार से बाहर से छपने वाले अखबार साथ उर्दू अखबार दो राष्ट्रीय पत्रिका से ज्यादा वाले 18 यूट्यूब और फेसबुक चैनल और इसके बाद लगभग 400 से ज्यादा 100000 से ज्यादा फॉलोवर वाले यूट्यूब और फेसबुक चैनल है। सरकार की नीतियां बड़े अखबार और बड़े चैनलों के लिए ही बनती है हालांकि इस बार चुनावी साल है तो डिजिटल के वैसे चैनल जिनको फेसबुक पर 50000 और यूट्यूब पर भी 50000 फॉलोअर हैं उनको बिहार सूचना जनसंपर्क विभाग द्वारा सूचीबद्ध किया गया है पर अभी तक विज्ञापन की प्रक्रिया प्रारंभ नहीं हुई है। जिन लोगों को विज्ञापन मिला है वह डिजिटल क्रिएटर हैं और वह सिर्फ सरकार के फेवर की ही चीजों को दिखाते है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि डिजिटल और प्रिंट साथ ही साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बिहार में कोई बड़ा पत्रकार संगठन नहीं है जो संगठन है वह पॉकेट संगठन है और दो चार लोगों के चेहरा चमकाने का साधन है। बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन में पिछले एक दशक से चुनाव नहीं हुआ है। एक दो राष्ट्रीय संगठन है पर बिहार के पत्रकारों के हक के लिए कभी भी कारगर पहल नहीं हो पाती।

