
बिहार हितैषी पुस्तकालय ( पटना सिटी) गुरुवार को अपना १४२ वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस प्राचीन नगर के देशभक्त दानवीरों के सहयोग से एक महान पुस्तकालय की स्थापना उस समय (1883) हुई थी, जब देश पराधीन था।
आज आजादी का पूरा श्रेय लेने का दावा करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म भी तब नहीं हुआ था। उस समय के पटना ने स्वाधीनता आंदोलन के लिए समाज को जाग्रत-शिक्षित करने की जरूरत को बड़ी गंभीरता से लिया था। स्वाधीनता की वैचारिक लौ तेज करना उस वक्त अंग्रेज शासकों के बनाये स्कूल-कॉलेज की मेकाले-प्रणीत औपचारिक शिक्षा के भरोसे सम्भव न था। अत: स्वातंत्र्य चेतना जागृत करने की भावना से बिहार हितैषी पुस्तकालय स्थापित किया गया। उस दौर के युवा अंग्रेजों के बनाये पाठ्यक्रम से बाहर निकल कर साहित्य – इतिहास और समकालीन पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन कर सकें, इस उद्देश्य के लिए स्थगित पटना का यह पुस्तकालय भी काशी नागरी प्रचारिणी सभा पुस्तकालय की परम्परा में आता है।
स्वाधीनता मिलने और कांग्रेस की सरकारों के आने पर इनमें से अधिकतर पुस्तकालय सरकारी या सरकारी-सहायता प्राप्त हो गए। सरकारीपन के साथ जो बुराइयां आती हैं, उससे पुस्तकालय भी नहीं बचे। इन संस्थाओं में जितनी तेजी से राजनीति और भ्रष्टाचार का प्रवेश हुआ, उतनी ही गति से उसकी प्रतिक्रिया हुई। सरकारीकरण के बाद समाज की सक्षम और सज्जन शक्तियों ने पुस्तकालयों से दूरी बना ली और स्वार्थी तत्वों के लिए यहां भी अवसर बनने लगा।
पुस्तकालय का मध्य काल
बिहार के लालू-राबड़ी काल में अनेक पुस्तकालय अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करते रहे। लगभग 15 साल बिहार हितैषी पुस्तकालय के लिए भी बहुत कठिन थे। उस दौर में सामाजिक कार्यकर्ता और जेपी आंदोलन के सेनानी नंदकिशोर यादव ( अब नगालैंड के राज्यपाल), एडवोकेट रामानंद तिवारी ( अब स्वर्गीय) , महेंद्र अरोड़ा, श्रीनिवास पाठक, हरिहर सिन्हा,रामकिशोर बरेरिया ( स्वर्गीय) ,शरदेंदु कुमार, रामानंद पांडेय, रघुबीर राय ( दिवंगत) , सुरेश रूंगटा, मोहन चतुर्वेदी ( शिक्षक), नवीन रस्तोगी और मेरे जैसे कई पत्रकारों-साहित्यसेवियों ने पुस्तकालय बचाने के लिए वह सब-कुछ किया, जो हमसे संभव था।
बिहार में नीतीश सरकार के दूसरे कार्यकाल (2010-15) से परिदृश्य बहुत बदला। शिक्षा, कानून-व्यवस्था, सडक-बिजली जैसे ढांचागत विकास के साथ पुस्तकालयों के भी दिन फिरे। उन्हें अनुदान मिलने शुरू हो गए। आज भवन और भौतिक स्वरूप में यह पुस्तकालय पहले से अधिक साधन-सम्पन्न है। इसने अपनी दरिद्रता दूर करने के कई रास्ते भी खोज लिए, लेकिन अब यह साहित्य, वेद-पुराण, इतिहास और पत्रकारिता के अध्ययन केंद्र की तरह नहीं, बल्कि करियर-सेंट्रिक छात्रों के स्टडी सेंटर की तरह अधिक उपयोगी हो गया है।
गेट्स फाउंडेशन की मदद
वर्ष 2013 में बिहार राज्य पुस्तकालय एवं सूचना केन्द्र प्राधिकार के तत्कालीन अध्यक्ष डा.रामवचन राय के सहयोग से बिहार के पुस्तकालयों के सुदृढ़ीकरण के लिए बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने श्रीकृष्ण सेवा सदन (मुंगेर) और बिहार हितैषी पुस्तकालय (पटना सिटी) को 23-23 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी थी। इस राशि से दोनों पुस्तकालयों में ‘ई-लाइब्रेरी स्थापित हुई और कंप्यूटर कोर्स भी संचालित हुए।
उस समय जब हम लोगों ने एक परिचर्चा में डा.रामबचन राय को विशिष्ट वक्ता के रूप में पुस्तकालय आमंत्रित किया था, तब वे भी इसकी भव्यता और सक्रियता पर मुग्ध हुए गए थे। डा. राय ने कहा था -” यह पुस्तकालय तो स्वयं बिहार की उम्र ( उस समय सौ वर्ष) से बड़ा है।”
अज्ञेय का स्मरण
सन् 1982-83 में जब मैं ‘आज’ (पटना) का पत्रकार था और पूर्व सांसद शंकरदयाल सिंह ( स्वर्गीय) से मेरी निकटता थी, तब उनके सहयोग से मुझे अज्ञेय जी से मिलने और उन्हें बिहार हितैषी पुस्तकालय के सभागार में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित करने का सौभाग्य मिला था। यह गर्व का पल था।
अज्ञेय जी उन दिनों जानकी जीवन यात्रा पर निकले थे। पटना में वे शंकर दयाल जी के अतिथि थे। पुस्तकालय आने से पहले वे डाक्टर कुमार विमल और प्रफुल्ल चंद्र ओझा ‘मुक्त’ से मिलने उन दोनों के घर गए थे। अज्ञेय जी का व्याख्यान अद्भुत था – वे जितने श्रेष्ठ रचनाकार थे, उतने ही प्रभावशाली वक्ता भी थे। उस ऐतिहासिक अवसर के चित्र शायद अब भी पुस्तकालय के मुख्य सभागार की दीवार पर टंगे हैं। 2014-15 में पुस्तकालय के जीर्णोद्धार और नए रंगरोगन के समय जब तत्कालीन प्रबंधन को मुख्य सभागार का नाम “अज्ञेय सभागार” करने का सुझाव दिया गया तो इसे स्वीकार नहीं किया गया।
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित
अज्ञेय जैसे महान साहित्यकार के प्रति बिहार हितैषी पुस्तकालय की ऐसी अकृतज्ञता दुर्भाग्यपूर्ण थी। यह बात आज भी चुभती है, लेकिन आज अवसर इस महान पुस्तकालय की उपलब्धियों का वंदन करने और इसके उज्जवल भविष्य की कामना करने का है।

