
शशि शेखर
सामान्य जाति के कम ही लोग होंगे, जो लालू जी से नफरत नहीं करते होंगे। कुछ को तो पता भी नहीं कि उन्हें ये नफ़रत है क्यों? चूंकि, उन्हें बचपन से इसी तरह कंडीशंड किया गया, परिवार/समाज/मीडिया द्वारा, कि लालू प्रसाद यादव का नाम सुनते ही उनकी जुबान करेले जैसी कड़वी हो जाती है। लेकिन, आप निष्पक्ष और जातिविहीन चश्मे से लालू जी के संपूर्ण राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन करेंगे, तो इस नफ़रत की चादर को उतार फेकेंगे। खैर, इन बातों को यहीं रहने देते हैं, क्योंकि आज देश के इस शानदार नेता Lalu Prasad Yadav का जन्मदिन है और ऐसे मौकों पर अच्छी बातें ही करनी चाहिए। सबसे पहले मेरी तरफ से उन्हें स्वस्थ जीवन की शुभकामनाएं।
इक ख़ास उम्र तक, ख़ास कर जब तक मैं बिहार में रहा (2004) तक, मुझे भी लगता रहा कि लालू यादव ने बिहार को बर्बाद कर दिया। जब उम्र बढ़ी, थोड़ा देश-दुनिया जाना, पॉलिटिक्स समझना शुरू किया तो लगा कि यार, मैं तो गलत था। लालू यादव ने बिहार के लिए जो किया है, वह तो काफी देर से उठाया गया कदम था। ये बात इसलिए कि मुझ समेत तमाम सामान्य जाति के लोगों ने अपने-अपने गांवों में देखा-महसूस किया है कि बिहार की आधी से अधिक आबादी वर्ग के लोग 1995-96 के दौर तक किसी सामान्य जाति के दरवाजे पर, कुर्सी पर नहीं बैठते थे। बिहार की एक बड़ी आबादी ने 95 के विधानसभा चुनाव में पहली बार वोट किया था।
एक किस्सा है। मेरे ननिहाल में धोबी जाति का एकमात्र परिवार हैं। काफी संपन्न, पढ़ा-लिखा। तकरीबन सभी लोग सरकारी नौकरी में। मैंने देखा है कि 1995-96 के दौर तक, उनके परिवार का कोई सदस्य मेरे मामा की चौकी पर या उनके सामने कुर्सी पर नहीं बैठता था। उस परिवार के दो लडके, एक ओवरसीयर, एक इंजीनियर। लेकिन उन्हें अलग पांत में बैठा कर खिलाया जाता। समय बदला, लालू राज आया। इस परिवार ने धीरे-धीरे गाँव में जा कर भोज खाना वगैरह बंद किया। सामान्य जाति के परिवारों को भी लगा कि इतने पढ़े-लिखे हैं सब, समय भी बदला है, तो इनलोगों ने भी अपने व्यवहार में चेंजेज लाए। कुल मिला कर अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही। इस बदलाव के नायक लालू प्रसाद यादव ही थे।
दक्षिण भारत में सोशल रेवोलुशन द्रविड़ आन्दोलन कहिये या के कामराज के समय ही पूरा हो गया था। लेकिन, उत्तर भारत में ये काम ज़रा देर से हुआ। और नि:संदेह इस काम को कर सकने वाले बिहार के एकमात्र नेता लालू प्रसाद यादव ही रहे। सोशल जस्टिस से शुरू हुआ कारवां नीतीश कुमार के सोशल इंजीनियरिंग तक पहुंचा। ये आरोप आज भी लगाए जा सकते हैं कि लालू जी के जमाने में बिहार आर्थिक तरक्की नहीं कर सका। लेकिन, ये भी सच है कि लालू जी के बाद के २० सालों में बिहारी समाज का जो सांस्कृतिक-चारित्रिक पतन हुआ है, उस वजह से इसने आर्थिक तरक्की का अपना entitlement भी खो दिया है। नीतीश कुमार ने नौकरी दे दे कर लोगों के मन में भर दिया कि विकास माने सरकारी नौकरी। रह गई बात लालू जी की, तो उन्हें ख़म ठोंक कर इस बात को बार-बार दुहराते रहना चाहिए कि वे बिहार की बागडोर बिहार की आर्थिक तरक्की के लिए अपने हाथों में नहीं लिए थे। इससे ज्यादा जरूरी काम थे उस वक्त, जो काम उन्होंने बखूबी किया। और यही एक बिंदु है, जहां आ कर बिहार का सामान्य जाति वर्ग लालू यादव को खलनायक ठहराना शुरू कर देता है।
फिलवक्त, मैं किसी भी डेटा एनालिसिस में नहीं उलझना चाहता, जिसका मैं खुद उस्ताद हूँ। इसके उलट, उस परसेप्शन को खंडित करना चाहता हूँ, जो गुजरात में विकास की नर्मदा बहता देखता है। जहां, आज भी कई जिलों में पीने के पानी का घोर अभाव हो जाता है। मतलब, विकास क्रमिक (Evolution) प्रक्रिया है, होते-होते-होते होती रहती है। वरना, 12 सालों में तो देश ने जादू की छडी घुमा कर देख ही लिया है। तो विषय से न भटकते हुए, इतना विकास तो बिहार तब भी कर लेता, लेकिन तत्कालीन इकोसिस्टम को यह बात समझ आ गयी थी और इसी वजह से दूसरे कार्यकाल से ही लालू प्रसाद यादव को जिस तरीके से टार्गेट किया जाने लगा, उसके बाद “विकास” किसी भी सरकार की प्राथमिकता हो ही नहीं सकती थी। जैसे, युद्ध इरान में होता है और हाथ जोड़ कर बातें हिन्दुस्तान के लोग करने लगते हैं टाइप।
मुजफ्फरपुर के नजदीक तुर्की के मुसहर टोली में चरवाहा विद्यालय खोलना कई लोगों को बेवजह लगा था। वो बाद में नहेने चला। बंद हुआ। जो हुआ, लेकिन लालू जी के ऐसे मूव्स ने सदियों से सुप्त चेतना को झकझोर दिया था। भैस के आगे की तरफ से भैंस पर चढ़ने जैसे मुहावरे उस दौर में सिम्बोलिक साइकोलाजिकल रेवोलुशन जैसा था। लोगों को नागवार गुजरा जब बूथ पर बराबरी की बातें होने लगी। हाँ, ये जरूर है कि लालू जी के दौर में कुछेक पिछड़ी जातियों का सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विकास खूब हुआ। वह भी कुछेक समूहों में। बाकी के लोग सत्ता के त्रिकाल डाउन थ्योरी लाभ से वंचित रह गए। लेकिन, वह सोशल जस्टिस रेवोलुशन ही था, जिसकी सवारी कर के भाजपा आज बिहार की सत्ता में पहुँची है। एक-एक, दो-दो प्रतिशत वाली अतिपिछड़ी आबादी को अपनी तरफ कर के। इस वर्ग को राजनैतिक रूप से जागृत किसने किया था? लालू प्रसाद यादव ने। १-१, २-२ प्रतिशत की ताकत ने ही आज बिहार में भाजपा को इतनी मजबूती दिलाई है।
बिहार में शिक्षा की बदतर स्थिति जो तब थी, आज भी वैसे ही है। स्कूल से ले कर यूनिवर्सिटीज तक। डबल इंजन की २० साल की सरकार के बाद भी। 1991 में संपूर्ण भारत की आर्थिक स्थिति डंवाडोल थी। तकनीक का आना अभी बाकी था। बिहार ही क्या, उत्तर प्रदेश समेत महाराष्ट्र जैसे सर्वाधिक शहरीकृत राज्यों में भी किसानों की हालत (विदर्भ/यवतमाल) दयनीय थी। ऊपर से हायर ज्यूडिशियरी का कमेन्ट “जंगल राज” और उस पर पक्षपाती मीडिया का जश्न मनाना। ये जरूरे है कि अपने परिवार के कुछेक सदस्यों के कारण लालू प्रसाद यादव को जरूर पोलिटिकल डैमेज हुआ। हालांकि, मैं इसे पॉलिटिक्स का कोलैटरल डैमेज ही मानूंगा। जैसे, इस तरह के कोलैटरल डैमेज इतिहास में कई तरीकों से कई नेताओं के लिए दर्ज किए जाएंगे और सिर्फ इसी बेसिस पर किसी अमुक नेता के पोलिटिकल लाइफ का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए। ठीक वैसे ही, साधू या सुभाष के बहाने लालू प्रसाद यादव जी के संपूर्ण राजनीतिक जीवन को खारिज नहीं किया जा सकता है।
मैं ये अवश्य मानता हूँ कि लालू जी या नीतीश जी को जो करना था, वे कर गए। अब नए जमाने के नए लोग आए हैं, उन्हें तो अब सोशल जस्टिस या सोशल इंजीनियरिंग का बोझ नहीं उठाना है। चाहे मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हो या नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव Tejashwi Yadav, उन्हें अब बिहार की आर्थिक तरक्की कर के दिखाना है। हालांकि, एक कैविएट ये भी रहेगा साथ कि बिहारी समाज सांस्कृतिक रूप से इतना पतित हो चुका है कि उसे विकास पाने/माँगने का अधिकार (Entitlement) नहीं है। फिर भी, यह देखना दिलचस्प होगा कि लालू जी के बाद के बिहार में विकास का मॉडल “सेटेलाईट टाउन” के बहाने जमीन हथियाना होगा या जमीन पर वाकई कुछ कांक्रीट काम होगा। तो, बिहार के सामान्य वर्ग के लोगों को अतीत की कड़वी यादों से निकल कर अब नए बिहार के नव-निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। विजिलेंट हो कर, सतर्क हो कर यह देखना होगा कि नए बिहार में विकास का कौन सा मॉडल अपनाया जाता है और इस सबसे उन्हें क्या मिलेगा, उनसे क्या छीनेगा?

