
शुभनीत कौशिक
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जिन यूरोपीय विद्वानों ने भोजपुरी भाषा और साहित्य पर उल्लेखनीय काम किया, उनमें जॉन बीम्स (1837-1902) का नाम अग्रणी है। फ़रवरी 1867 में जॉन बीम्स ने रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में पश्चिमी बिहार में बोली जाने वाली भोजपुरी पर एक व्याख्यान दिया था। उस वक़्त बीम्स चंपारन के ज़िला मजिस्ट्रेट थे। अगले ही वर्ष जॉन बीम्स का यह महत्त्वपूर्ण लेख ‘जर्नल ऑफ़ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’ में छपा। उपर्युक्त लेख में बीम्स ने भोजपुरी भाषा के क्षेत्र-विस्तार और उसकी ध्वनियों की विस्तृत चर्चा करने के साथ ही भोजपुरी-अंग्रेज़ी की एक संक्षिप्त शब्दावली भी तैयार की थी। साथ ही, उन्होंने भोजपुरी क्षेत्र के, विशेषकर चंपारन के पुरातात्विक स्थलों के महत्त्व की भी चर्चा की थी। अपने इस लेख की शुरुआत ही बीम्स इन शब्दों से करते हैं : ‘भोजपुरी बोली चंपारन, सारण, शाहाबाद, ग़ाज़ीपुर, आज़मगढ़ और गोरखपुर के ब्रिटिश ज़िलों में बोली जाती है और इसे बोलने वालों की संख्या 50 लाख है।’
भाषाविज्ञान के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान देने वाले जॉन बीम्स को प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘आर्य भाषा परिवार के तुलनात्मक अध्ययन का पुरोधा’ कहा है। भाषाओं के प्रति बीम्स का गहरा अनुराग इंग्लैंड में ही प्रकट हो चला था, जहाँ उन्हें हैलेबरी कॉलेज में संस्कृत और फ़ारसी की परीक्षा में सर्वाधिक अंक मिले थे। अंग्रेज़ी, जर्मन, इतालवी, लैटिन और ग्रीक के जानकार बीम्स ने हिंदुस्तान आकर बांग्ला, पंजाबी, उर्दू और हिन्दी पर अपनी पकड़ बनाई।
बीम्स की इन भाषाओं में पारंगतता उन्हें तुलनात्मक भाषाविज्ञान की ओर ले गई और 1867 में उन्होंने भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का निरूपण करते हुए अपनी किताब ‘आउट्लायंस ऑफ़ इंडियन फ़िलोलॉजी’ लिखी। उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में भारत के आर्य भाषा-परिवार पर उनका ग्रंथ ‘कंपेरेटिव ग्रामर ऑफ़ द मॉडर्न आर्यन लैंग्वेजेज ऑफ़ इंडिया’ तीन जिल्दों में छपा।
जॉन बीम्स हैलेबरी कॉलेज से आने वाले ईस्ट इंडिया कम्पनी के आख़िरी बैच के अधिकारी थे। जनवरी 1856 में प्रशिक्षण के लिए बीम्स हैलेबरी कॉलेज में चुने गए थे। उल्लेखनीय है कि बंगाल सिविल सेवा का सदस्य बनने से पूर्व बीम्स ने पंजाब और गुजरात में भी अपनी सेवाएँ दीं। चंपारन का मजिस्ट्रेट नियुक्त होने से पहले वे अंबाला, लुधियाना, शाहाबाद और पूर्णिया में तैनात रहे।
चंपारन में अंग्रेज़ निलहों के विरुद्ध हिंदुस्तानी रैयत का साथ देने के कारण बीम्स को कुछ समय के लिए निलम्बित कर दिया गया था। जिसकी वजह से वे इंग्लैंड लौट गए। किंतु साल भर बाद ही बीम्स की सेवा बहाल करते हुए उन्हें उड़ीसा में बालासोर का कमिश्नर बनाया गया। बाद में, वे कटक और चटगाँव में भी नियुक्त रहे।
भाषाविज्ञान के साथ-साथ भारतीय इतिहास में भी जॉन बीम्स की गहरी रुचि रही। बीम्स के इतिहास विषयक लेख ‘जर्नल ऑफ़ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल’, ‘इंडियन एंटिकक्वेरी’, ‘इंडियन ऑब्ज़र्वर’ जैसी पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित हुए। बीम्स ने हिंदुस्तान में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपने अनुभवों को अपने संस्मरण में दर्ज किया है, जो ‘मेमायर्स ऑफ़ ए बंगाल सिविलियन’ शीर्षक से प्रकाशित है।

