दयानन्द सरस्वती हाईस्कूल मेरे जीवन का एक महान स्मारक है!

उज्जैन के दयानन्द सरस्वती हाईस्कूल से जुड़ी नौ वर्षों की स्मृतियाँ, संघर्ष, शिक्षा, गुरुजनों का स्नेह और बचपन की अनमोल यादों को समर्पित एक भावुक संस्मरण।

Neeral Prakash
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सुशोभित

यह मेरा स्कूल है! पहली से आठवीं कक्षा तक मैं यहीं पर पढ़ा। इसमें उत्तरार्द्ध (केजी-2) का एक साल भी जोड़ दें तो कुल नौ वर्षों तक (1986-1994) मैं यहाँ नियमित आया हूँ। हर साल पढ़ाई के अढ़ाई सौ से ज़्यादा दिन मान लें तो ये सैकड़ों दिन हो गए। हर दिन छह घंटे की कक्षाएँ मान लें तो असंख्य पल-छिन!

यह उज्जैन में रामघाट मार्ग पर रामानुजकोट के समीप स्थित था और एक बाड़े में संचालित होता था। बाड़े का नाम भी रामबाड़ा था! यहाँ एक बड़े से बरामदे और कुछ कक्षों में ‘कच्ची-पहली’ (केजी-1) से लगाकर आठवीं तक कुल दस कक्षाएँ लगा करती थीं। कक्षाओं में मेज़ें-कुर्सियाँ नहीं थीं। हम सभी लिपे हुए फ़र्श पर दरी बिछाकर बैठते थे। टापरे की छत थी, जो बाँसों के सहारे टिकी थी। गर्मियों में यह ख़ूब तपती। कभी-कभी बारिश में टापरे चूने लगते तो हम सभी अपने-अपने बस्ते सहेजकर एक कोने में खड़े हो जाते, कि कॉपी-किताब गीली ना हो जाएँ। एक बार तो इतनी सघन ओलावृष्टि हुई कि छुट्टी कर देनी पड़ी थी। तब हम सब बहुत प्रसन्न होकर, धारासार वर्षा को मन ही मन धन्यवाद कहते घर लौटे थे।

विगत अप्रैल में वर्षों बाद अपने इस स्कूल गया था। यह अब संचालित नहीं होता है। सम्भव है इसे ध्वस्त करके यहाँ कोई नया निर्माण करा दिया जाए, क्योंकि यह शिप्रा नदी के बहुत समीप है और आगामी सिंहस्थ महाकुम्भ में लाभार्जन के लिए भू-माफियाओं की नज़र इस पर जमी है। जब मैं वहाँ गया तो अतीत के भग्नावशेष सरीखे इस स्थान पर बहुत देर यों ही निष्प्रयोज्य टहलता रहा। मैं सोच रहा था कि यहाँ बिताए असंख्य क्षणों को अपनी स्मृति के सामर्थ्य से थोड़े ही समय में कैसे उलीच डालूँ? क्या यह सम्भव भी है? मृत्यु के क्षण में भी शायद मनुष्य को ऐसा ही लगता होगा, जब पूरे जीवन का चलत्-चित्रव्यूह उसकी आँखों के आगे दुहरा जाता होगा। किन्तु इतने लम्बे, सुदीर्घ जीवन के अनन्त क्षणों को चन्द लम्हों के चलचित्र में कैसे समेटा जा सकता है?

मेरी ही एक कविता की पंक्तियाँ हैं :

“तृषा में इतना ताप देना कि \ जब एक बार अवलोक आऊँ \ जीवन का समूचा संग्रहालय तो \ आत्मकरुणा से डिगूँ नहीं।
एक क्षण में कोई मरता नहीं \ एक निमिष में गलता नहीं हिमालय।
एक बार लौटकर स्वयं को विदा कह सकूँ \ प्रलय के उपरान्त \ इतना अवकाश तो दोगे ना, प्रभो!”

मेरी अनेक कहानियों का रंगमंच भी यह स्कूल है। उन कहानियों को लिख डालने के लिए तब मैंने स्वयं को साधुवाद दिया, क्योंकि उनके ज़रिये मैं भौतिक रूप से उपस्थित नहीं होकर भी कई बार मन ही मन यहाँ लौटकर आता रहा हूँ। ‘बचपन की सहेली’, ‘ट्रक चलाने वाला दोस्त’, ‘हिम्मत की कहानी’, ‘एक अपराधी से मुलाक़ात’, ‘मेरी टीचर्स की स्मृतियाँ’, ‘रावण आया’- ये सभी कहानियाँ इसी लीलाभूमि में घटित हुई हैं। और असंख्य ऐसे स्मृतिचित्र भी, जो कभी भाषा की दीर्घा में नहीं समाए। इस स्कूल के संचालक श्री बाबूलाल बैरागी हुआ करते थे। मेरी माँ ने उनसे सादर अनुरोध किया था कि मेरा लड़का होनहार है पर मेरे पास फ़ीस चुकाने के पैसे नहीं, कृपया इसका शुल्क माफ़ कर दें। आश्चर्य कि उन्होंने उनकी बात मानी और मुझे नौ साल मुफ़्त पढ़ाया! मैं इसके लिए उनका सदैव कृतज्ञ रहा। अब ना मेरी माँ हैं, और ना ही बैरागी जी इस संसार में हैं।
आज मेरी जैसी, जितनी भी बुद्धि, मति, शिक्षा, दीक्षा है, उन सबकी गढ़न इसी कार्यशाला में हुई है। उज्जैन का यह दयानन्द सरस्वती हाईस्कूल मेरे जीवन का एक महान स्मारक है!

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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नीरल प्रकाश के पास पत्रकारिता में 2 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने एंकरिंग, रिपोर्टिंग और स्क्रिप्ट राइटिंग में काम किया है। पिछले 2 सालों से वे IDTV इंद्रधनुष के साथ काम कर रही हैं, जहां उन्होंने ऑन-एयर प्रस्तुतिकरण के साथ-साथ बैकएंड कंटेंट क्रिएशन में भी योगदान दिया। समाचार रिपोर्टिंग के अलावा, उन्होंने आकर्षक स्क्रिप्ट तैयार करने और कहानी को पेश करने का अनुभव भी प्राप्त किया है।