
दयानंद राय
आज भाई संजय कृष्ण ने रांची विश्वविद्यालय के अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे डॉ केशव प्रसाद की स्मृतियां साझा कीं। उनकी तस्वीर देखकर मुझे उनसे जुड़ा प्रसंग याद आ गया। कहानी लगभग पंद्रह साल पुरानी है। उन दिनों मैं साहित्यकार डॉ अशोक प्रियदर्शी सर के हरमू वाले घर अक्सर जाता था। वहां मुझे डॉ केशव प्रसाद सर की एक किताब मिली। उन्होंने उस किताब को समीक्षा के लिए डॉ अशोक प्रियदर्शी सर को दिया था। मैंने वो किताब ली और उसकी समीक्षा खुद करके एक पत्रिका में प्रकाशित कर दी। जैसे ही ये जानकारी डॉ केशव प्रसाद सर को मिली, उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया। यहां वो मुझसे बड़े प्यार से मिले और मेरी समीक्षा की तारीफ की। उनसे बात करके मुझे अंदाजा हो चुका था कि डॉ केशव प्रसाद अंग्रेजी के विद्वान तो हैं ही हिन्दी साहित्य का भी उनका समृद्ध अध्ययन है।
एक बार पीबीएल नजर टीवी में मैंने उनका इंटरव्यू भी किया। सर ने उस इंटरव्यू में भी अपनी वक्तृत्व क्षमता से मुझे प्रभावित किया। भाई संजय कृष्ण ने सही लिखा है कि टीएस एलियट उनके प्रिय कवि रहे। उन्हें वे पढ़ाते थे। उनकी कविता द वेस्ट लैंड का अनुवाद उन्होने ‘बंजर धरती’ नाम से किया था। वे कहते हैं, एलियट की कविताओं में मेरी रुचि 1949 में हुई। तब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। एक के बाद एक उनकी कविताएं पढ़ता गया।
1953 में, 21 साल की उम्र में टीएस एलियट के काव्य सिद्धांत पर लेख लिखा, जो त्रैमासिक ‘आलोचना’ में छपी थी। सोना, जागना, उठना, बैठना…हर समय एलियट उनके साथ होते। जाक देरिदा के ‘डिफरेंस’ को लेकर कहते हैं कि हमने मतवादों से अलग हटकर इस पर लिखा। इतना विपुल लेखन के बाद भी वे अपने समय और शहर से ओझल ही हैं। डॉ अशोक प्रसाद सर को मैंने जितना जाना उससे यही समझ में आया कि वे सचमुच विद्वान थे, पर न वे विद्वता का दिखावा करते थे न उन्होंने प्रसिद्धि की कामना की। ऋषि की तरह चुपचाप अपना काम करते रहे।
आज के इस प्रदर्शनप्रिय समय में डॉ अशोक प्रसाद जैसे विद्वान लोग विरल हैं। अब शायद ईश्वर ने भी ऐसा सांचा बनाना छोड़ दिया जिससे ढलकर डॉ अशोक प्रसाद जैसे लोग निकलते हैं। कायदे से तो ऐसे तपस्वी लोगों ने जो लिखा उसपर चर्चा होनी चाहिए, पर जो धरती राधाकृष्ण जैसे लोगों को लगभग भुला चुकी है वो डॉ अशोक प्रसाद के अवदान को भूल जाए तो इसमें ज्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
विनम्र श्रद्धांजलि सर।

