
- मुंडारी साहित्य के संवर्धन हेतु विचार-मंथन, भाषा को रोजगार और वैश्विक पहचान से जोड़ने पर बल
Mundari Language : मुंडारी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समृद्ध संस्कृति और ज्ञान परंपरा की वाहक है। रविवार को ये बातें डीएसपीएमयू के पूर्व कुलपति प्रो. डॉ सत्यनारायण मुंडा ने कहीं। वे आरयू के टीआरएल डिपार्टमेंट में मुंडारी साहित्य पर आयोजित परिचर्चा में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि मुंडारी भाषा का प्रत्येक शब्द वैज्ञानिकता और गहन अर्थों से परिपूर्ण है। आवश्यकता इस बात की है कि इसके अध्ययन, अनुसंधान और प्रचार-प्रसार को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाए।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुंडारी विभाग के शोधार्थियों की ओर से पारंपरिक गोवारी और स्वागत गीत की प्रस्तुति के साथ हुआ। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ. बिरेन्द्र कुमार सोय ने सभी अतिथियों का शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया। अपने स्वागत भाषण में उन्होंने कहा कि पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा के समय विभाग में नियमित रूप से विचार गोष्ठी, संगोष्ठी और सेमिनार आयोजित होते थे, जिनके माध्यम से साहित्य सृजन और भाषा के विकास की कार्ययोजनाएं तैयार की जाती थीं। उन्होंने कहा कि ऐसी परिचर्चाएं भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं तथा इन्हें निरंतर जारी रखा जाना चाहिए।

कार्यक्रम में डॉ. किशोर सुरीन ने मुंडारी विभाग की स्थापना से लेकर वर्तमान तक की विकास यात्रा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने विभाग की उपलब्धियों, चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए शोध और प्रकाशन कार्यों को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता बताई।
वहीं, वरिष्ठ साहित्यकार सोमा सिंह मुंडा ने अपने संबोधन में कहा कि भाषा और साहित्य को जीवंत बनाए रखने के लिए पढ़ना और लिखना दोनों आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का है और मुंडारी भाषा पर भी तकनीकी स्तर पर कार्य हो रहा है, जिससे भविष्य में इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त हो सकती है।
इसी तरह एतवा मुंडा ने भाषा के माध्यम से रोजगार सृजन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यदि भाषा को शिक्षा, तकनीक और रोजगार से जोड़ा जाए तो युवाओं की रुचि भी बढ़ेगी और भाषा का भविष्य अधिक सुरक्षित होगा।
मुंडारी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष मनय मुंडा ने कहा कि भाषा का विकास सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। उन्होंने समाज, शिक्षकों और विद्यार्थियों को मिलकर भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए कार्य करने का आह्वान किया। डॉ. मनसिद्ध बड़ायउद ने कहा कि मुंडारी भाषा के सभी शिक्षकों और शोधकर्ताओं को साहित्य सृजन एवं शोध कार्यों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
परिचर्चा के दौरान शोधार्थियों और विद्यार्थियों के बीच पारंपरिक नामों, कहानियों और लोकज्ञान से जुड़े प्रश्नोत्तर भी आयोजित किए गए, जिसे प्रतिभागियों ने अत्यंत रुचिकर और ज्ञानवर्धक बताया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अजीत मुंडा और जुरा होरो ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. करम सिंह मुंडा ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में विशेश्वर मुंडा, डॉ. जुरन सिंह मानकी, गुंजल इकिर मुंडा, साबित्री कुमारी, वासुदेव हासा, इंदिरा कोंगाड़ी, डॉ. सिजेरेन सुरीन, डॉ. लखिन्द्र मुंडा, सबरन सिंह मुंडा, महावीर मुंडा, करम सिंह ओड़ेया, डॉ. सोहन मुंडा, इसाबेला होरो, मार्शल पूर्ति, डॉ. खातिर हेम्ब्रोम, डॉ. अलबिना जोजो, लवलीन होरा, विनाधर सांडिल, रचना होरो सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित थे।

