यह योजना राजकुमारी फाउंडेशन के माध्यम से संचालित की जा रही थी। सिविल सर्जन कार्यालय, बोकारो से RTI के तहत मिली जानकारी में बताया गया है कि परियोजना पर 37,45,102 रुपये खर्च हुए। लेकिन खर्च के समर्थन में जरूरी बिल-वाउचर और उपयोगिता प्रमाण पत्र फाउंडेशन की ओर से विभाग को उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।

मामला यहीं तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर तक विभाग के रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है। पिछले छह महीने में वाहन ने कितनी दूरी तय की, किन गांवों तक पहुंचा और कितने स्वास्थ्य शिविर लगाए गए, इसकी जानकारी देने वाली लॉगबुक, GPS डेटा और रूट रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं हैं।

ऐसे में यह सत्यापित करना मुश्किल हो रहा है कि स्वास्थ्य वाहन ने वास्तव में कितने गांवों तक अपनी सेवाएं पहुंचाईं और कितने ग्रामीणों को इसका लाभ मिला।
RTI से मिली जानकारी में स्वास्थ्य वाहन पर तैनात डॉक्टरों, नर्सों, एएनएम और लैब टेक्नीशियन के नाम, उनकी शैक्षणिक योग्यता और पंजीकरण से जुड़े दस्तावेज भी विभाग के पास उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई है। इसके अलावा दवाओं की खरीद और वितरण से संबंधित स्टॉक रजिस्टर की प्रतियां भी उपलब्ध नहीं कराई गई हैं।
इससे योजना के संचालन, स्वास्थ्यकर्मियों की योग्यता और दवाओं के इस्तेमाल की निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, राजकुमारी फाउंडेशन को उपायुक्त-सह-जिला दंडाधिकारी कार्यालय के DMFT कोषांग के तहत स्वास्थ्य वाहन संचालन का कार्यादेश दिया गया था। अब इस मामले में कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर 37.45 लाख रुपये के खर्च का सत्यापन किस आधार पर किया गया? बिल-वाउचर और उपयोगिता प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं थे, तो भुगतान की निगरानी कैसे हुई? और योजना के संचालन से जुड़े रिकॉर्ड कहां हैं?
फिलहाल RTI से सामने आई जानकारी ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, इन सवालों पर संबंधित विभाग या फाउंडेशन का पक्ष सामने आना बाकी है।


