Hazaribagh News: हजारीबाग जिले के बड़कागांव में दीपावली मनाने का अंदाज कुछ बेहद खास है। यहां दीपावली के दूसरे दिन लोग सोहराय पर्व मनाते हैं। इस पर्व में इंसानों के साथ-साथ पशुओं को भी विशेष सम्मान दिया जाता है। किसान अपने बैल, भैंस और गाय को माता लक्ष्मी के समान मानकर उनकी पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
दरअसल, बड़कागांव के ग्रामीण इलाकों में सोहराय पर्व की परंपरा सदियों पुरानी है। खेती-किसानी में पशुओं के महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए यह पर्व उनके प्रति प्रेम, सम्मान और आभार प्रकट करने का प्रतीक माना जाता है।
इस पर्व की तैयारियां कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं। किसान अपनी गौशालाओं की साफ-सफाई कर गोबर और मिट्टी से लिपाई-पुताई करते हैं। वहीं, आदिवासी समुदाय की महिलाएं घरों और दीवारों पर खूबसूरत सोहराय चित्रकारी बनाती हैं।
पर्व के दिन गाय, बैल और भैंसों को नहलाया जाता है। उनके शरीर पर लाल रंग से आकर्षक आकृतियां बनाई जाती हैं। इसके बाद उनके सींगों और माथे पर सिंदूर का टीका लगाया जाता है और विधि-विधान से पूजा की जाती है।
इस परंपरा की सबसे खास बात है पशुओं को सात तरह के अनाज से बने पकवान खिलाना। इसके अलावा मकई या अरवा चावल से खीर तैयार की जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में खेरा या पंखेवा कहा जाता है। केले के पत्तों पर रखकर यह पकवान पशुओं को खिलाया जाता है।
इतना ही नहीं, पशुओं की देखभाल करने वाले चरवाहों यानी गोरखिया को भी नए कपड़े देकर सम्मानित किया जाता है। इसके बाद कई इलाकों में सोहराय मेले का आयोजन होता है।
बड़कागांव की इस परंपरा का संबंध प्राचीन सोहराय कला से भी है। आसपास की इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के पुराने नमूने देखने को मिलते हैं। खास बात यह है कि गांव की महिलाएं आज भी शादी-विवाह और त्योहारों पर दीवारों पर सोहराय चित्रकारी बनाकर इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।


