11 लाख रुपये का इफको साहित्य सम्मान मिलने पर बोलीं डा ऋता शुक्ल-अब तक के लिखे का यह सम्मान है

77 वर्ष की उम्र में भी साहित्य साधना में जुटीं डॉ. शुक्ल ने 37 रचनाओं से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। वैदिक विदुषियों पर उनके उपन्यास नई पीढ़ी को प्रेरित करेंगे।

Neeral Prakash
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रांची: चांद पत्रिका के आद्य संपादक पं नंददिशोर तिवारी की वंशजा। 77 साल की दृढ़ काया। अनवरत साधना। उम्र के इस पड़ाव पर गार्गी-याज्ञवल्क्य पूरा हुआ है और ऋषिका सरस्वती प्रकाशित होने के लिए भेज दिया है। इस बीच यह सुखद सूचना मिली। हमने मोबाइल से बधाई दी। उधर से उलाहना-का हो, एतना दिन बाद फोन कइल ह। जब पूछा, इस उम्र में यह पुरस्कार? कैसा लग रहा है। लंबी तपस्या व लगातार सृजन का प्रतिफल है। इधर, कई सालों तक अस्वस्थ में रही, बावजूद दो उपन्यास पूरा किया। यह सम्मान समग्र लेखन का है। इस सूचना से न खुशी हुई न दुख हुआ। इतने दिनों तक लिखे, यह उसको सम्मान मिला है। जीवन के अंतिम छोर पर यह उपलब्धि 37 रचनाओं और संपूर्ण जीवन सार, प्राण शिराओं को दहका के काम करने को मिला है। इस पुरस्कार से युवा वर्ग को भी प्रसन्नता होगी।
आपके लेखन में पिता का कितना योगदान रहा है? डा शुक्ल कहती हैं, मेरे लेखन में मेरे पिता का 16 आने योगदान है। मेरे पिता ने उंगली पकड़कर सिखाया। मैं उनकी कलम छीनकर लिखती थी। उनकी छत्र-छाया में लिखना सीखा। उनकी आंखों में पलते सपने को साकार करने की कोशिश की। एक बार मेरे पिता मृत्यु के निकट पहुंच गए थे। वे बड़बड़ा रहे थे-मेरी बेटी साहित्यकार बनेगी? उस समय मेरी उम्र आठ-नौ महीने की रही होगी। चाचा (दिनेश प्रसाद वर्मा) पास बैठे थे। उन्होंने ही सबको बताया कि वे बेहोशी की हालत में यही बोल रहे थे। मैंने बाबूजी (आचार्य रामेश्वर नाथ तिवारी) के सपनों को पूरा करने की कोशिश आज भी कर रही हूं।
इस उम्र में भी लेखन जारी है? प्रेरणा कहां से मिलती है? बताया न, पिता से। मां का भी योगदान कम नहीं। सुप्रसिद्ध गायिका विंध्यवासिनी देवी की गोद में पली हूं। दोनों मां से गीत सीखा। मां के पास भी लोक गीतों का खजाना था और वह खूब मन से गाती थीं। इस तरह गीतों का सहज संस्कार मेरे मन में घर गया। इस तरह पारिवारिक वातारण भी साहित्यिक ही था।
इधर, आपने वैदिक विदुषियों पर लिखने के पीछे कोई कारण? हां, आज की पीढ़ी को जानना चाहिए कि वैदिक नारियां कितनी विदुषी रही हैं। गार्गी को देखिए। लोपा, सरस्वती आदि-आदि। इनके जीवन चरित्र, ज्ञान और तर्क शक्ति के बारे में जेनजी वाली पीढ़ी को पता चलना चाहिए। जिस तरह का भ्रम स्त्री को लेकर फैलाया गया, उसका प्रतिउत्तर हैं ये उपन्यास। अभी एक और उपन्यास लगभग आधा हो गया है-यह मेरी कहानी। यह भी स्त्री को लेकर है। बच्चियों के जीवन-संघर्ष को भी समेटा गया है।

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नीरल प्रकाश के पास पत्रकारिता में 2 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने एंकरिंग, रिपोर्टिंग और स्क्रिप्ट राइटिंग में काम किया है। पिछले 2 सालों से वे IDTV इंद्रधनुष के साथ काम कर रही हैं, जहां उन्होंने ऑन-एयर प्रस्तुतिकरण के साथ-साथ बैकएंड कंटेंट क्रिएशन में भी योगदान दिया। समाचार रिपोर्टिंग के अलावा, उन्होंने आकर्षक स्क्रिप्ट तैयार करने और कहानी को पेश करने का अनुभव भी प्राप्त किया है।