

रांची : झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रदेश प्रवक्ता अख्तर अली ने केंद्र की बीजेपी सरकार की आर्थिक नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि सरकार द्वारा पेश किए जा रहे 7.8% जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े खोखले हैं। हकीकत यह है कि इस जीडीपी की चमक के पीछे आम भारतीय परिवारों की बेबसी, घटती बचत, बढ़ता कर्ज और एमएसएमई सेक्टर की तबाही छिपी हुई है। उन्होंने केंद्र सरकार से तीन मुख्य आर्थिक मुद्दों पर सीधे सवाल पूछे हैं।





सरकार 7.8% जीडीपी ग्रोथ का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन भारतीय परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत पिछले 50 सालों के सबसे निचले स्तर (जीडीपी के लगभग 5%) पर पहुंच गई है। वहीं दूसरी ओर, आम जनता पर व्यक्तिगत कर्ज रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। केंद्र सरकार जवाब दे कि क्या देश के लोग अपनी जमा-पूंजी खाकर या कर्ज लेकर अपना घर चलाने को मजबूर नहीं हैं, ताकि सरकार के जीडीपी का आंकड़ा चमकता रहे?
देश में 90% से अधिक रोजगार देने वाले छोटे और मध्यम उद्योग (MSME) आज फंड की भारी कमी झेल रहे हैं। MSME सेक्टर में आज भी लगभग ₹30 ट्रिलियन (30 लाख करोड़ रुपये) का क्रेडिट गैप मौजूद है। बैंकों का अधिकांश कर्ज चंद चुनिंदा बड़े कॉरपोरेट घरानों को सौंपा जा रहा है। चैंपियन एमएसएमई जैसी योजनाओं के विज्ञापनों के बावजूद जीडीपी में सूक्ष्म उद्योगों की हिस्सेदारी क्यों नहीं बढ़ रही, यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि देश में K-Shaped Recovery चल रही है, जहां अमीर और अमीर हो रहे हैं तथा छोटा व्यापारी खत्म हो रहा है।
मेक इन इंडिया का फ्लॉप शो और रोजगार विहीन विकास
बीजेपी सरकार पिछले एक दशक से मेक इन इंडिया का ढोल पीट रही है, लेकिन हकीकत यह है कि जीडीपी में विनिर्माण (Manufacturing Share) का हिस्सा पिछले 10-12 सालों से महज 16% पर अटका हुआ है, जबकि सरकार का लक्ष्य इसे 25% करने का था। 144 करोड़ की आबादी वाले इस देश में मात्र 1.95 करोड़ लोग ही फैक्ट्रियों में कार्यरत हैं। अरबों रुपये की पीएलआई (PLI) स्कीमों के बाद भी सरकार बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने में पूरी तरह विफल रही है।
अख्तर अली ने कहा कि आज देश का गरीब और मध्यम वर्ग खाद्य पदार्थों की बेतहाशा बढ़ती कीमतों और महंगाई से त्रस्त है। केंद्र सरकार का इस पर कोई अंकुश नहीं है। भारत के आम परिवारों को आंकड़ों की बाजीगरी और जीडीपी की चमक से पेट नहीं भरता, उन्हें दो वक्त की सुखी रोटी चाहिए जो इस सरकार की गलत नीतियों के कारण उनसे छीनी जा रही है।
