


यह मामला देवघर के वरिष्ठ पत्रकार विमलेन्दु नारायण से जुड़ा था। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रकाशित समाचार, उसकी विषयवस्तु और पत्रकार की भूमिका पर विचार किया।





SDPO के बयान को ही बनाया गया था खबर का आधार
सुनवाई के दौरान सामने आया कि संबंधित समाचार एक SDPO द्वारा दिए गए आधिकारिक बयान पर आधारित था। पत्रकार ने पुलिस अधिकारी द्वारा कही गई बातों को समाचार के रूप में प्रकाशित किया था।
अदालत ने माना कि किसी जिम्मेदार पुलिस अधिकारी द्वारा दिए गए आधिकारिक बयान को रिपोर्ट करना पत्रकार के सामान्य पेशेवर कार्य का हिस्सा है। यदि रिपोर्टर ने उस बयान में अपनी ओर से कोई तथ्य नहीं जोड़ा या उसे तोड़-मरोड़कर पेश नहीं किया, तो महज प्रकाशन के आधार पर पत्रकार को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
पत्रकार ने अपनी ओर से तथ्य नहीं गढ़े तो नहीं बनेगा अपराध
हाईकोर्ट ने पत्रकार की भूमिका और उसके द्वारा प्रकाशित सामग्री के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना। अदालत के समक्ष ऐसा कोई तथ्य नहीं आया कि पत्रकार ने पुलिस अधिकारी के बयान से अलग अपनी ओर से कोई आरोप या तथ्य गढ़ा हो।
यही वजह रही कि अदालत ने पत्रकार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के आधार पर सवाल उठाया। अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश यह है कि किसी अधिकारी के बयान को रिपोर्ट करना और खुद कोई आरोप या झूठा तथ्य तैयार करना एक समान नहीं है।
पत्रकारिता में आधिकारिक जानकारी को जनता तक पहुंचाना भी जिम्मेदारी
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्रकारों का काम घटनाओं और अधिकारियों द्वारा दी गई सूचनाओं को जनता तक पहुंचाना है। ऐसे में किसी आधिकारिक बयान की निष्पक्ष रिपोर्टिंग को केवल इस आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता कि पत्रकार ने उसे प्रकाशित किया।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पत्रकार तथ्यों की जांच और निष्पक्षता की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। रिपोर्टिंग में तथ्यात्मक शुद्धता जरूरी है और जानबूझकर गलत या मनगढ़ंत जानकारी जोड़ने की स्थिति अलग हो सकती है।
पत्रकारों के लिए क्यों अहम है यह टिप्पणी?
झारखंड हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उन पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है जो पुलिस, प्रशासन और अन्य सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक बयानों के आधार पर समाचार तैयार करते हैं।
फैसले से यह संकेत मिलता है कि निष्पक्ष तरीके से किसी जिम्मेदार अधिकारी के आधिकारिक बयान की रिपोर्टिंग करना अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं है। पत्रकार की वास्तविक भूमिका, खबर का स्रोत और उसमें उसकी ओर से जोड़ी गई सामग्री जैसे पहलुओं को देखे बिना केवल समाचार प्रकाशित करने के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जानी चाहिए।
