हूल दिवस पर राज्यपाल और सीएम ने सिदो-कान्हू समेत वीर शहीदों को किया नमन, बोले-उनका बलिदान हमारी पहचान

हूल दिवस पर झारखंड में राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने सिदो-कान्हू समेत संथाल विद्रोह के शहीदों को श्रद्धांजलि दी। भोगनाडीह से शुरू हुए ऐतिहासिक आंदोलन को किया गया याद।

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रांची: झारखंड में मंगलवार को हूल दिवस के मौके पर राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने संथाल विद्रोह के महान आदिवासी नायकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। दोनों नेताओं ने इस ऐतिहासिक आंदोलन में शहीद हुए वीरों के बलिदान को याद किया। गौरतलब है कि 1855-56 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ हुए संथाल विद्रोह की स्मृति में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। इसे ‘संथाल हूल’ के नाम से भी जाना जाता है। इस विद्रोह का नेतृत्व झारखंड में सिदो और कान्हू मुर्मू भाइयों ने किया था।

राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनका साहस और बलिदान आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा-“मैं हूल विद्रोह के अमर वीरों सिदो-कान्हू, चांद-भैरव, फूलो-झानो समेत सभी वीर नायकों और वीरांगनाओं को कोटि-कोटि नमन करता हूं। ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनका संघर्ष और बलिदान हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता रहेगा।”

वहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी हूल दिवस पर वीर शहीदों को नमन किया। उन्होंने सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो सहित सभी शहीदों के बलिदान को याद किया। सीएम ने अपने संदेश में कहा कि भोगनाडीह की धरती से 30 जून 1855 को उठी हूल की आवाज ने शोषण और अन्याय के खिलाफ बड़ी लड़ाई को जन्म दिया था। उन्होंने कहा कि हमारे पुरखों ने साफ संदेश दिया था कि जल, जंगल, जमीन, भाषा, संस्कृति और अस्मिता पर किसी भी शोषक सत्ता का अधिकार स्वीकार नहीं किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए हमारे वीरों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, लेकिन अन्याय के सामने कभी झुके नहीं। उन्होंने सभी शहीदों के प्रति झारखंडवासियों की ओर से आभार व्यक्त किया। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड राज्य अपने गठन के 25 वर्ष पूरे कर चुका है और अब नई ऊर्जा व नए संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। “अबुआ सरकार” वीर पुरखों के सपनों को साकार करने के लिए प्रतिबद्ध है।

हूल दिवस के ऐतिहासिक महत्व की बात करें तो 30 जून 1855 को भोगनाडीह गांव से इस विद्रोह की शुरुआत हुई थी। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन, महाजनों और जमींदारों द्वारा संथाल समुदाय के शोषण के खिलाफ एक बड़ा जनविद्रोह था। इसे भारत के औपनिवेशिक शासन के खिलाफ शुरुआती और सबसे संगठित आदिवासी आंदोलनों में से एक माना जाता है।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।