केंद्रीय मंत्री के गृह जिले कोडरमा में सबसे कम लिंगानुपात, ‘रेड कैटेगरी’ में हुआ शामिल

झारखंड के कोडरमा में जन्म के समय लिंगानुपात सबसे कम दर्ज किया गया है। राज्य औसत से 100 अंक पीछे यह स्थिति सामाजिक और कानूनी चुनौतियों को उजागर करती है।

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रांची: झारखंड में कोडरमा जिला जन्म के समय लिंगानुपात (सेक्स रेशियो एट बर्थ) के मामले में पूरे राज्य में सबसे निचले पायदान पर है। स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (HMIS) के वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, कोडरमा में प्रति 1,000 लड़कों पर केवल 832 लड़कियां ही जन्म ले रही हैं, जो राज्य के औसत 937 से 100 अंक कम है। यह स्थिति तब है जब इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी और विधायक नीरा यादव जैसी प्रमुख महिला नेता कर रही हैं।

पिछड़ते जिलों की स्थिति

कोडरमा के आंकड़ों में पिछले वर्षों 2024-25 में 798 की तुलना में मामूली सुधार हुआ है, लेकिन यह लगातार राज्य के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले जिलों में बना हुआ है। कोडरमा के अलावा राज्य के पांच अन्य जिले भी लगातार कम लिंगानुपात के कारण रेड कैटेगरी में बने हुए हैं। वहीं हजारीबाग में वर्ष 2025-26 में लिंगानुपात 873 दर्ज किया गया। देवघर में लिंगानुपात में गिरावट देखी गई है, जो 2023-24 के 901 से घटकर 864 पर आ गया है। चतरा की बात करें तो 2024-25 में 842 से सुधरकर अब 880 पर पहुंचा, लेकिन अभी भी औसत से काफी पीछे है। गिरिडीह भी 898 और पलामू 896 भी चिंताजनक श्रेणी में शामिल हैं। इसके अलावा बोकारो, धनबाद, पूर्वी सिंहभूम, गढ़वा, रामगढ़ और रांची को येलो कैटेगरी में रखा गया है।

बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिले

जहां कुछ जिले संघर्ष कर रहे हैं, वहीं पश्चिम सिंहभूम प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,026 महिला जन्म दर के साथ राज्य में शीर्ष पर है। इसके बाद लोहरदगा 1,004, खूंटी 989 और रांची 977 तथा सरायकेला-खरसावां 977 का स्थान है, जो राज्य में एक संतुलित आंकड़े है।

लिंगानुपात में गिरावट के मुख्य कारण

विशेषज्ञों और अधिकारियों के अनुसार इस गिरावट के पीछे कई सामाजिक और भौगोलिक कारण हैं। कोडरमा के बिहार से सटे होने के कारण और क्षेत्र में गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्तात्मक सोच, बेटों की चाहत और दहेज प्रथा के बोझ के चलते लड़कियों के खिलाफ भेदभाव जारी है। 1996 से लागू पीसी एंड पीएनडीटी (PC & PNDT) एक्ट के बावजूद चोरी-छिपे लिंग निर्धारण के मामले सामने आ रहे हैं। कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर भ्रूण के लिंग की जानकारी सीधे न देकर कोड वर्ड (Code words), प्रतीकों या बिचौलियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से दी जाती है।

अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने जिलों की समीक्षा करने के बाद पीसी-पीएनडीटी अधिनियम के तहत राज्य उपयुक्त प्राधिकरण का पुनर्गठन किया गया है, जिसके अध्यक्ष एनएचएम (NHM) के मिशन डायरेक्टर होंगे। विभाग इन संदिग्ध संकेतों के आधार पर अल्ट्रासाउंड केंद्रों की निगरानी कर रहा है। जहां मरीजों के अधूरे या रिकॉर्ड गायब हैं।अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच संदिग्ध रेफरल पैटर्न की निगरानी की जा रही है। तय नियमों से अधिक अल्ट्रासाउंड केंद्रों से जुड़े डॉक्टरों के रिकॉर्ड पर नजर रखी जा रही है। जनता या व्हिसलब्लोअर से मिलने वाली शिकायतें भी विभाग की प्राथमिकता में है।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।