

श्वेता सिंह





कोलकाता में आग कोई नई त्रासदी नहीं है। कभी अस्पताल, कभी होटल, कभी बाजार और कभी रिहायशी इमारत-लपटें उठती हैं, जिंदगियां बुझती हैं और उसके बाद शुरू होती है जांच।
2011 के एएमआरआई अस्पताल अग्निकांड में 93 लोगों की मौत हुई थी। स्टीफन कोर्ट में 43 जानें गईं। सूर्य सेन स्ट्रीट मार्केट में 19 लोगों की मौत हुई। 2025 के ऋतुराज होटल अग्निकांड में 14 लोग मारे गए और अब मिर्जा गालिब स्ट्रीट के होटल अग्निकांड में 9 जिंदगियां चली गईं।
हर हादसे के बाद फायर सेफ्टी पर सवाल उठते हैं, जांच के आदेश होते हैं और कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था भी सामान्य हो जाती है, जबकि उन परिवारों की जिंदगी कभी सामान्य नहीं होती जिन्होंने अपनों को खोया है?
मिर्जा गालिब स्ट्रीट की जिस इमारत में करीब 15 होटल और गेस्ट हाउस चल रहे थे, वहां आपातकालीन निकासी मार्ग बाधित होने का आरोप सामने आया। दूसरी ओर, अधिकारियों के मुताबिक संबंधित प्रतिष्ठानों के पास जरूरी फायर और ट्रेड लाइसेंस थे।
तो फिर सवाल सीधा है-लाइसेंस था तो सुरक्षा कहां थी? निरीक्षण हुआ तो खामियां क्यों नहीं दिखीं? और अगर खामियां दिखीं तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
आग लगने के बाद दमकल पहुंचना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि लोगों के पास बाहर निकलने का रास्ता खुला हो।
होटल में सो रहा मेहमान हो, अस्पताल का मरीज हो, बाजार में काम करने वाला मजदूर हो या किसी इमारत में रहने वाला परिवार-हर किसी की जिंदगी कागज पर जारी किए गए प्रमाणपत्र से ज्यादा कीमती है।
सवाल सरकार से भी है, प्रशासन से भी और उस व्यवस्था से भी, जो हादसे के बाद जागती है।
क्या फायर सेफ्टी केवल लाइसेंस और कागजों तक सीमित है?
क्या हर होटल, अस्पताल और बहुमंजिला इमारत की सुरक्षा की नियमित और ईमानदार जांच होती है?
और सबसे बड़ा सवाल-क्या अगला अग्निकांड होने से पहले हम अपनी व्यवस्था को बदलेंगे, या फिर कुछ और परिवारों के उजड़ने का इंतजार करेंगे?
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।
