


Kurmi Samaj : 6 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अमित महतो के नेतृत्व में कुड़मी समाज ने विशाल धरना-प्रदर्शन किया और इस दिन को ‘ब्लैक डे’ (काला दिवस) के रूप में मनाया। प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच भारी गहमागहमी देखने को मिली।





इस आंदोलन में झारखंड, ओडिशा, असम और पश्चिम बंगाल से कुड़मी समाज के सभी प्रमुख संगठन एकजुट होकर शामिल हुए। प्रदर्शन में मुख्य रूप से युवा आंदोलनकारी अमित महतो, शीतल ओहदार और ओडिशा से दिव्या मोहता की सक्रिय उपस्थिति रही।
जेल जाने से भी पीछे नहीं हटूंगा: अमित महतो
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित महतो ने अपने संबोधन में कहा, “2023 के आंदोलन में मुझे 71 दिन जेल जाने का सौभाग्य मिला था। आज दिल्ली के जंतर-मंतर से अगर समाज के अधिकारों की रक्षा के लिए मुझे फिर से जेल भी जाना पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूंगा।”
इसके साथ ही उन्होंने समाज को आह्वान करते हुए कहा कि यदि इस लड़ाई के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया जाता है, तो समाज के लोग एकजुट होकर दिल्ली पहुंचे और अपने अधिकारों के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ें।
क्या है आंदोलन की मुख्य वजह?
आंदोलनकारियों के अनुसार, 6 सितंबर 1950 को छोटा नागपुर पठार में रहने वाले टोटेमिक गुष्ठीधारी कुड़मी महतो समाज के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ था। 1950 से पहले यह समाज 12 अन्य जनजातियों के साथ ‘एबोरिजिनल ट्राइब एनिमिस्ट’ के रूप में दर्ज था, लेकिन नई शेड्यूल ट्राइब (ST) सूची जारी होते समय इन्हें ST की सूची से हटाकर OBC श्रेणी में डाल दिया गया।
समाज का दावा है कि अंग्रेजों के ‘शिमला गैजेट’ के नोटिफिकेशन के आधार पर उनका हक ST सूची में ही बनता है। इसी फैसले के विरोध में वर्ष 2017-18 से हर साल 6 सितंबर को जंतर-मंतर पर ‘ब्लैक डे’ का आयोजन किया जा रहा है।
कुड़मी समाज की प्रमुख मांगें:
1).कुड़मी महतो समाज को पुनः अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल किया जाए।
2).कुड़मालि भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिले।
3).प्रकृति पूजक कुड़मी जनजाति समाज के लिए अलग ‘सरना/धर्म कोड’ लागू हो।
4).आगामी जनगणना में ‘कुरमालि थार’ के स्थान पर ‘कुड़मालि’ दर्ज किया जाए, ताकि 2027 की जनगणना में सटीक आंकड़े सामने आ सकें।
आदिवासी कुड़मि समाज (दिल्ली) एवं ऑल इंडिया टोटेमिक कुड़मि एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह लड़ाई आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य, युवाओं के पलायन को रोकने और सरकारी नौकरियों में हक दिलाने के लिए है। समाज के नेताओं ने अपील की कि सांस्कृतिक पर्वों के साथ-साथ अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक होना भी बेहद आवश्यक है।
