नई दिल्ली: प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर एक गैर-सरकारी संगठन ने घरों में रखी अप्रयुक्त और ‘एक्सपायर’ (समय-सीमा समाप्त) हो चुकी दवाओं को वापस लेने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्था बनाने का आग्रह किया है। संगठन ने जल प्रदूषण, गलती से दवाएं खा लेने और रोगाणुरोधी प्रतिरोध के खतरों का हवाला देते हुए दवा की दुकानों पर अनिवार्य रूप से संग्रह पेटियां लगाने और दवाओं के सुरक्षित निस्तारण की जिम्मेदारी दवा निर्माता कंपनियों को सौंपने का सुझाव दिया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 20 अक्टूबर को भेजे गए एक ज्ञापन में एनजीओ ‘राइट टू लाइफ’ ने कहा कि भारत में दवा निर्माताओं, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं और स्वास्थ्य संस्थानों से निकलने वाले औषधीय कचरे के निस्तारण के लिए नियामक व्यवस्था है, लेकिन आम लोगों के पास घरों में रखी अप्रयुक्त या समय-सीमा समाप्त हो चुकी दवाओं को सुरक्षित तरीके से लौटाने की कोई व्यवस्था नहीं है। संगठन ने ‘विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व’ (ईपीआर) के सिद्धांत पर आधारित राष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत दवा निर्माता कंपनियां घरों से अप्रयुक्त दवाएं एकत्र करने और उनके सुरक्षित निस्तारण का खर्च उठाएंगी।

संगठन ने कहा, ‘‘भारत ने पिछले कुछ वर्षों में दवा आपूर्ति श्रृंखला में बिना बिकी और समय-सीमा समाप्त हो चुकी दवाओं के निस्तारण के लिए एक सुव्यवस्थित व्यवस्था विकसित की है। इसमें खुदरा विक्रेता से लेकर थोक विक्रेता और निर्माता तक शामिल हैं। अस्पतालों और क्लीनिकों से निकलने वाले चिकित्सा कचरे के निस्तारण की भी व्यवस्था है। लेकिन जैसे ही कोई दवा बिक्री के बाद घर पहुंचती है, ये सभी व्यवस्थाएं समाप्त हो जाती हैं।’’ इसमें कहा गया कि घरों में लोग अक्सर समय-सीमा समाप्त हो चुकी गोलियां, सिरप, मलहम और इंजेक्शन सामान्य घरेलू कचरे में फेंक देते हैं। संगठन का कहना है कि घरों में रखी अप्रयुक्त और समय-सीमा समाप्त हो चुकी दवाओं को वापस लेने के लिए व्यवस्था बनने से पर्यावरण और जन स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान को टाला जा सकता है।


