एशियाई खेलों में चमक बिखेरने के लिए तैयार है पहलवान निशा दहिया

बार-बार चोट और हार से जूझने वाली निशा दहिया ने अब नतीजे की चिंता छोड़कर मेहनत पर ध्यान देना सीख लिया है। एशियाई खेलों में पदक पर नजर है।

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सियोल: वर्षों से निशा दहिया को हर चोट के बाद यही सवाल परेशान करता था कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है। जब सब कुछ ठीक होता दिख रहा था, तभी शरीर ने क्यों साथ नहीं दिया। जिस टूर्नामेंट में उन्हें अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद थी उसमें निराशा क्यों मिली। निशा ने अब असफलताओं को सहजता से स्वीकार करना सीख लिया है और अपने करियर में बार-बार बाधा डालने वाली चोटों के बारे में शिकायत करना बंद कर दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने यह सीख लिया है कि वह अपने काम पर नियंत्रण बना सकती हैं परिणाम पर नहीं। मानसिकता में इस बदलाव के साथ जब निशा एशियाई खेलों में महिलाओं के 68 किलोग्राम वर्ग में मैट पर उतरेगी तो बस अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर ही ध्यान देगी।

निशा ने पीटीआई से कहा, ‘‘पहले मुझे लगता था कि भगवान मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। मैं सोचती थी, मेरे साथ बार-बार ऐसा क्यों हो रहा है। लेकिन अब मैं ऐसा नहीं सोचती।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अब मैं समझ गई हूं कि मुझे वही मिलेगा जो मेरे भाग्य में लिखा है। मैं केवल अपने काम पर ध्यान दूंगी, कड़ी मेहनत करूंगी और अच्छी कुश्ती लडूंगी। मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर ध्यान दूंगी।’’ निशा का करियर अक्सर उम्मीदों से भरा रहा है, लेकिन परिणाम उनके अनुरूप नहीं रहे हैं। विश्व चैंपियनशिप 2022 में लिंडा मोराइस के खिलाफ 4-0 की बढ़त बनाने के बावजूद कांस्य पदक के मुकाबले में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद चोटिल होने के कारण वह कई महीनों तक खेल से दूर रहीं।

पेरिस ओलंपिक 2024 में निशा के पदक जीतने की पूरी संभावना दिख रही थी। क्वार्टरफाइनल में वह उत्तर कोरिया की पाक सोल गम से 8-1 से आगे थीं लेकिन उनकी उंगली में मोच आ गई और कंधे में चोट लगी जिससे वह आखिर में 8-10 से हार गई। निशा ने कहा, ‘‘परिणाम हमारे हाथ में नहीं होता है। हर कोई जीत हासिल करना चाहता है। कभी-कभी मुकाबला अनुकूल होता है तो कभी-कभी आप दबाव में आ जाते हैं। पेरिस में मैं अच्छा प्रदर्शन कर रही थी लेकिन फिर चोट लग गई। चोट किसी के नियंत्रण में नहीं होती।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब आप अच्छी तरह से अभ्यास कर रहे होते हैं, तो सब कुछ सुचारू रूप से चलता है। फिर चोट सब कुछ बिगाड़ देती है और आप अगले छह महीनों तक ठीक से अभ्यास नहीं कर पाते। आप मानसिक रूप से काफी हद तक टूट जाते हैं। मैं तब भगवान से कहती कि वह मेरे साथ ही ऐसा क्यों कर रहे हैं।’’ लेकिन अब उन्होंने शिकायत करना और अतीत में जीना छोड़ दिया है। उन्होंने कहा, ‘‘अगर आप अतीत में ही खोए रहेंगे तो आप आगे नहीं बढ़ पाएंगे। आपको और आगे बढ़ना होगा। मुझे लॉस एंजिलिस ओलंपिक में खेलना है, मुझे पदक जीतना है। अगर मुझे वहां तक पहुंचना है, तो छोटी-छोटी चीजों को पीछे छोड़ना होगा।’’

निशा का मानना है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका आक्रामक खेल और उनका आत्मविश्वास है। लेकिन डब्ल्यूएफआई द्वारा नियुक्त दो बार के ओलंपिक पदक विजेता जापानी कोच कोसेई अकाइशी के साथ काम करने से उनके कौशल में एक और आयाम जुड़ गया है। उन्होंने कहा, ‘‘उनकी कुश्ती भारतीय कुश्ती से थोड़ी अलग है। उनके पास तेज गति और सटीक तकनीकें हैं। उनके सोचने का तरीका अलग है। उनके पास कुछ ऐसी तकनीकें हैं जो हमारे लिए नई हैं और इससे हमें बहुत मदद मिली है। निश्चित रूप से इससे मुझे बेहतर पहलवान बनने में मदद मिल रही है।’’

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।