
नई दिल्ली : बिहार की राजनीति में लंबे समय तक केंद्रीय भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार ने मंगलवार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर एक ऐसे अध्याय पर विराम लगाया, जिसकी विरासत उपलब्धियों और विवादों के मिश्रण के रूप में देखी जाएगी। खुद को “न्याय के साथ विकास” के सूत्रधार के रूप में स्थापित करने वाले जनता दल (यूनाइटेड) अध्यक्ष की छवि जहां सुशासन और बुनियादी ढांचे के विस्तार से जुड़ी रही, वहीं लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों ने उनके सफर को उतना ही जटिल और बहुआयामी बना दिया।
अब राज्यसभा सदस्य बन चुके नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर हमेशा संतुलन साधने की कला से जुड़ा रहा- एक ओर भाजपा के सहारे सत्ता में बने रहना और दूसरी ओर सामाजिक न्याय व सांप्रदायिक सौहार्द के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करना। 75 वर्षीय नीतीश कुमार के खाते में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज हैं, जिनमें से कुछ उनके उस दौर से जुड़ी हैं जब वे पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार में मंत्री थे।
कहा जाता है कि वाजपेयी उन्हें अपने सबसे सक्षम सहयोगियों में गिनते थे और बिहार में लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली राजद सरकार को चुनौती देने के प्रयासों के दौरान उन्हें राजग का चेहरा बनाने में उनकी अहम भूमिका रही। अपने समय के श्रेष्ठ सांसदों में शुमार रहे कुमार ने रेल मंत्री के रूप में भारतीय रेल के आधुनिकीकरण में विशेष रुचि दिखाई और कई अहम पहल कीं। उन्होंने 2005 में जब बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली, तो एक ऐसे राज्य की छवि बदलने का बीड़ा उठाया, जिसे लंबे समय तक अराजकता और पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देखा जाता था। उनके पहले पांच वर्षों के कार्यकाल को, उनके कट्टर आलोचक भी, बदलाव की ताजी बयार लाने वाला मानते हैं। एक कठोर और व्यवहारिक राजनेता के रूप में नीतीश कुमार ने सत्ता की राजनीति में कभी झिझक नहीं दिखाई। मोकामा के विधायक अनंत कुमार सिंह जैसे विवादित चेहरों के साथ समीकरण साधने से भी उन्होंने परहेज नहीं किया, वहीं दूसरी ओर पुलिस तंत्र को सशक्त बनाकर कानून का राज स्थापित करने की कोशिश भी जारी रखी-यह उनके शासन की विरोधाभासी लेकिन विशिष्ट पहचान रही। लोकलुभावन नीतियां हमेशा उनकी राजनीति का अहम आधार रहीं। सत्ता में आने के शुरुआती दौर में छात्राओं को मुफ्त साइकिल और वर्दी जैसी योजनाएं उनकी पहचान बन गईं, जबकि कार्यकाल के उत्तरार्ध में 125 यूनिट मुफ्त बिजली और प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म शुल्क माफी जैसी घोषणाएं उस समय सामने आईं।

