नयी दिल्ली: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) का कहना है कि नदियों में बड़े आकार के प्लास्टिक कचरे का पता लगाने के लिए तैयार प्रोटोकॉल से प्लास्टिक प्रदूषण को मापने, वर्गीकृत करने और उसकी निगरानी के लिए एक मानकीकृत तरीका उपलब्ध होगा तथा इससे प्रदूषण वाले ‘हॉटस्पॉट’ की पहचान कर लक्षित कार्रवाई में मदद मिल सकती है।

एनएमसीजी ने ने मंगलवार को ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां, पैकेजिंग और अन्य कचरे जैसे दिखाई देने वाले प्लास्टिक कचरे को आसानी से देखा जा सकता है, लेकिन प्लास्टिक प्रदूषण के स्तर और उसके प्रवाह को समझने के लिए केवल आंखों से दिखाई देने वाली चीजों से कहीं अधिक जानकारी की जरूरत होती है।
मिशन ने कहा कि ‘प्रोटोकॉल फॉर रिवराइन मैक्रोप्लास्टिक्स मॉनिटरिंग’ को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने ‘इंडिया इंटरनेशनल वॉटर वीक 2026’ के नौवें संस्करण के दौरान जारी किया।
एनएमसीजी के अनुसार, यह प्रोटोकॉल नदियों में ‘‘मैक्रोप्लास्टिक्स को मापने, वर्गीकृत करने और उनकी निगरानी’’ के लिए एक मानकीकृत प्रक्रिया का प्रस्ताव करता है।
मिशन ने कहा कि निगरानी की इस प्रक्रिया से नदियों में मौजूद बड़े आकार के प्लास्टिक कचरे के स्रोतों की पहचान की जा सकेगी और यह समझने में मदद मिलेगी कि ‘‘नदी में मैक्रोप्लास्टिक्स कहां से आते हैं, उनकी निगरानी कैसे की जाती है और आंकड़े हमें क्या बताते हैं।’
एनएमसीजी ने बताया कि 25 मिलीमीटर से बड़े प्लास्टिक के टुकड़ों या कचरे को मैक्रोप्लास्टिक्स कहा जाता है।
मिशन ने कहा कि निगरानी से ‘‘हॉटस्पॉट की पहचान करने और लक्षित कार्रवाई में मदद’’ मिल सकती है, जिससे नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से निपटने में सहायता होगी।
एनएमसीजी ने कहा, ‘‘क्योंकि जिसे हम मापते हैं, उसे समझ सकते हैं और जिसे समझते हैं, उसका बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं।’’


