
डॉ पवन विजय
दीवालों पर शुभ अल्पनाएं, दरवाजे पर फूलों की लता, आंगन में हरसिंगार का पेड़, द्वार पर आम, अनार, नीम, नींबू के पेड़, घर के किनारे क्यारियों में रात रानी, सदाबहार, गुलाब, गेंदा, चंपा, मधुकामिनी, केतकी फूली हो। मटमैली दीवाल पर मौसम का असर दिख रहा हो। सुबह उठो तो फूल झरे हों, पात गिरे हों। आम की डालियों से लाल सूरज झांकता हो। उस पर बैठी कोयल बोल रही हो और गिलहरियां फुदक रही हों।
बारिश की खनखनाहट रोशनदान से पानी की नमी के साथ आती हो, वे तमाम गीत जो झींगुर ने जगनुओं को सुनाए थे। वे तमाम किस्से जिसे मेंढकों ने मछलियों को सुनाए थे सब के सब उसी रोशनदान से घर के बच्चे भी सुन रहे हों। उनकी भाषा को डिकोड करते समय कल्पनाओं के देश की खोज कर सकें जहां उन्हें तितलियां ले जाती हों, वही दूर देश जहां कोई परी रानी उन्हें बादलों के जहाज पर सैर कराया करती हो।
क्या वाकई अब धरती पर अब वे दिन नहीं रहे जहां बच्चे हंसकर उठा करते हों, उन्हें सुबह उनकी दादी प्यार करके जगाया करती हो, सुबह साढ़े छह बजे स्कूल बस का तीखा हॉर्न सुनकर मम्मियों के साथ भागते बच्चों को देखकर लगता तो है कि दुनिया बदल गई है, लेकिन मेरा मन उसी फूलों के दरवाजे वाले घर में अटका है जिसके अंदर किसी पायल की रुनझुन सावन की बूंदों के समांतर झनक रही है। आंगन में शायद झूला पढ़ा है, पेंग बढ़ाकर कोई बालिका आसमान छू रही है। कजरी की धुन दरवाजे के बाहर तक आ रही है। घर वैसे ही खत्म हो गए हैं, जैसे पूस का दिन खत्म हो जाता है। अब टू बीएचके वाली अंतहीन रात है जिसमें चांद नहीं दिखता, केवल मोटर और भीड़ का शोर है।
लेखक प्रोफेसर, समाजशास्त्री और साहित्यकार हैं।

