रांची : विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग एवं श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि हिंदू धर्म में पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर माना गया है। यह अवधि हमें अपने उन पितरों को स्मरण करने का संदेश देती है, जिनके संस्कार, त्याग और आशीर्वाद से परिवार और समाज की परंपराएं आगे बढ़ती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन तथा दान-पुण्य करने से पितरों की तृप्ति और शांति की कामना की जाती है।इस वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध 26 सितंबर को होगा। इसके अगले दिन 27 सितंबर से पितृपक्ष के प्रमुख श्राद्ध आरंभ होंगे और 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध पितृपक्ष से ठीक पहले होता है और इसे पितृपक्ष का नियमित भाग नहीं माना जाता।


पितृपक्ष का मूल उद्देश्य दिवंगत पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। मान्यता है कि जिन पितरों की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो,उसी तिथि पर पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने की परंपरा है। श्राद्ध में संकल्प लेकर पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान किया जाता है। परंपरा में जल, तिल और कुश से तर्पण का विशेष महत्व है।
श्राद्ध कर्म सामान्यतः दिन के अपराह्न काल में किया जाता है तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार उपयुक्त मुहूर्त का पालन किया जाता है।पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की जड़ों, संस्कारों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व भी है। यह नई पीढ़ी को अपने परिवार के इतिहास और परंपराओं से जोड़ने का अवसर देता है। इस अवधि में जरूरतमंदों को भोजन कराना, वस्त्र एवं अन्न का दान करना तथा सेवा कार्य करना पुण्यकारी माना जाता है।पितृपक्ष का संदेश है कि मनुष्य अपने पूर्वजों को केवल स्मृति में ही नहीं, बल्कि उनके संस्कारों और आदर्शों को अपने जीवन में अपनाकर भी सच्ची श्रद्धांजलि दे। श्रद्धा, सेवा, दान और सदाचार के साथ मनाया गया यह पर्व परिवार में संस्कार, एकता और कृतज्ञता की भावना को मजबूत करता है।


