पुंछ हिरासत मौत मामला : ब्रिगेडियर को न्यायाधिकरण के क्लीन चिट देने पर गुज्जर नेताओं में रोष

Archana Ekka
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जम्मू/नयी दिल्ली: जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में दिसंबर 2023 में तीन नागरिकों की हिरासत में हुई मौत के मामले में सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ की गई प्रशासनिक दंडात्मक कार्रवाई को रिकॉर्ड से हटाने के सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) के फैसले पर गुज्जर समुदाय के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं ने नाराजगी जाहिर की है। न्यायाधिकरण के फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गुज्जर समुदाय के नेता शाहनवाज चौधरी ने कहा कि दो साल की “कड़ी नाराजगी” वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद ब्रिगेडियर पद्मसंभव आचार्य का नाम प्रशासनिक रिकॉर्ड से हटाया जाना समुदाय के साथ “पूरी तरह विश्वासघात” है। यह विवाद 21 दिसंबर, 2023 को पुंछ जिले के डेरा की गली (डीकेजी) इलाके के पास घात लगाकर किए गए हमले के जवाब में चलाए गए एक अभियान से शुरू हुआ। घात लगाकर किये गए हमले में चार सैनिक मारे गए थे और उनमें से दो के शवों के साथ बर्बरता की गई थी।

तलाशी अभियान के दौरान, सुरक्षा बलों ने पूछताछ के लिए स्थानीय नागरिकों को हिरासत में लिया। हिरासत में लिए गए लोगों में से तीन की मौत मस्तान धारा स्थित कंपनी ऑपरेटिंग बेस पर पूछताछ के दौरान कथित तौर पर लगी चोटों के कारण हो गई और इस यातना का एक कथित वीडियो सोशल मीडिया पर लीक हो गया। 16वीं कोर के मुख्यालय के आदेश पर हुई कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के बाद, ब्रिगेडियर आचार्य (जो उस समय 13 सेक्टर की कमान संभाल रहे थे) के खिलाफ दंडात्मक प्रशासनिक कार्रवाई की गई। यह कार्रवाई उचित कमान और नियंत्रण न रखने, नागरिकों के साथ गलत व्यवहार करने और ज्यादतियों को रोकने में नाकाम रहने के कारण की गई। चौधरी ने कहा, “गुज्जरों ने हमेशा अपने दिल की गहराइयों में देशभक्ति की भावना को संजोकर रखा है और कभी भी इसके प्रदर्शन की जरूरत महसूस नहीं की, लेकिन बार-बार हमें अन्याय का सामना करना पड़ता है।”

जब यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई, तो चौधरी और उनकी टीम ने सेना को काफी मदद की। सेना ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया, जिससे लोगों का गुस्सा शांत करने में मदद मिली। चौधरी ने कहा कि यह बात हमारी न्यायिक व्यवस्था का मजाक उड़ाती है कि सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी को दो साल तक निंदा का सामना करना पड़ा, लेकिन अब एक न्यायाधिकरण के आदेश में कहा गया है कि अधिकारी की इस कार्रवाई का असर उनके व्यक्तिगत रिकॉर्ड पर नहीं पड़ेगा।
उन्होंने कहा, “दूसरे शब्दों में, यह न्यायिक प्रक्रिया भविष्य में उस अधिकारी की पदोन्नति का रास्ता साफ कर रही है और इस तरह उन बेगुनाह लोगों की जान जाने के मामले में जवाबदेही को कमजोर कर रही है।” उन्होंने सरकार से कहा कि वह उन लिखित बयानों का जवाब दे जो कार्यवाही के दौरान दाखिल किए गए थे। इन बयानों में दावा किया गया था कि मस्तान धारा में नागरिकों को “यातना” दिए जाने के समय, डीकेजी के नियंत्रण कक्ष में वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी थी, जिसमें नगरोटा में तैनात 16वीं कोर के तत्कालीन कोर कमांडर भी शामिल थे।

उन्होंने कहा, “कानूनी बारीकियों का सहारा लेकर नैतिक और कामकाज से जुड़ी जिम्मेदारी के मुद्दे से बचा नहीं जा सकता।”
सामाजिक कार्यकर्ता जाहिद परवाज ने कहा, “न्याय महज दिखावे की मामूली सजा नहीं है जो पदोन्नति का वक्त आते ही भुला दी जाए।” पास के नियंत्रण कक्ष से उच्च पदस्थ अधिकारियों द्वारा निगरानी किए जाने संबंधी अधिकारी के दावों का हवाला देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता परवाज ने निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी कि कमान स्तर की जिम्मेदारी तय करने से बचना संवेदनशील क्षेत्रों में नागरिक-सैन्य जवाबदेही के लिहाज से एक खतरनाक मिसाल साबित होगा। जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व वरिष्ठ अधीक्षक और ‘गुज्जर देश चैरिटेबल ट्रस्ट’ के महासचिव शरीफ चौहान ने जोर देकर कहा कि “पूरी जवाबदेही ही सेना की एकमात्र नैतिक ताकत है”। चौहान ने कहा, “अगर अंदरूनी रिपोर्ट से यह साबित होता है कि शीर्ष कमांडरों को पता था कि उनके जवान कुछ ही किलोमीटर दूर बड़े पैमाने पर अत्याचार कर रहे थे, तो रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियों में बदलाव करने का न्यायाधिकरण का फैसला सशस्त्र बलों के अनुशासन के लिए नुकसानदेह होगा।”

एएफटी की सुनवाई के दौरान, पीठ ने उस अधिकारी की याचिका खारिज कर दी जिसमें आठ जुलाई, 2024 को दर्ज “सख्त नाराजगी” को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि नागरिकों के खिलाफ बल का अत्यधिक प्रयोग बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और भावनाओं को सैन्य अनुशासन और संवैधानिक दायित्वों के पीछे रखना होगा। अधिकारी ने निंदा की कार्रवाई को चुनौती दी और दावा किया कि “अभियान के दौरान नियंत्रण कक्ष में 16वीं कोर के कोर कमांडर और आतंकवाद रोधी बल ‘रोमियो’ के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे, इसलिए उन्हें भी इस गलती की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।” अधिकारी ने कहा कि यह साफ तौर पर ऐसा मामला था जिसमें कोर कमांडर खुद ही अपने मामले में न्यायाधीश की भूमिका निभा रहे थे। इन दलीलों को खारिज करते हुए, एएफटी की पीठ ने कहा कि जमीनी स्तर पर संचालित अभियान का निर्देशन, नियंत्रण और देखरेख सेक्टर कमांडर और कमांडिंग ऑफिसर के पास होती है।

न्यायाधिकरण ने कहा कि सशस्त्र बल (जम्मू-कश्मीर) विशेष अधिकार अधिनियम (ऑफ्स्पा), 1990 के दिशा-निर्देशों के तहत बनी नीति में शारीरिक बल और थर्ड-डिग्री तरीकों के इस्तेमाल पर सख्त रोक है। इसके बावजूद, रक्षा मंत्रालय की 30 अक्टूबर 2023 की नीति को ध्यान में रखते हुए – जिसके अनुसार कोर कमांडर की “गंभीर नाराजगी” की अवधि केवल दो साल होती है – न्यायाधिकरण ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि ब्रिगेडियर के प्रशासनिक रिकॉर्ड से इस दंडात्मक कार्रवाई को हटा दिया जाए। पीठ ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड से इस कार्रवाई को हटाना केवल इस विशेष मामले में अपवाद के तौर पर किया गया है।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।